#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*अबिहड़ का अँग ३७*
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अबिहड़ अँग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ ।
दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥१०॥
व्यापक - स्वरूप ब्रह्म कभी भी किसी से अलग नहीं होता, वह अपरिवर्तन रूप है, बदल कर कहीं भी नहीं जाता । अत: न घटने - बढ़ने वाला एकरस ब्रह्म सब में परिपूर्ण है ।
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*अंत समय की साखी*
जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन ।
साहिब अपणे कारणैं, भलो निबाह्यो प्रण ॥११॥
इति अबिहड़ का अँग समाप्त: ॥ ३७ ॥ सा - २५२७ ॥
हे मन ! जितने भी मायिक गुण अन्त:करण में व्याप्त होते हैं, उन सबको त्याग करके और उन्हें अन्त:करण में पुन: न आने देने का प्रण करके अपने प्रभु - प्राप्ति के लिए उस प्रण का तूने अच्छा निर्वाह किया है । इस साखी के तीन चरण ही ब्रह्मलीन होने के समय उच्चारण किये थे ।
*इति श्री पूज्यचरण स्वामी धनराम के शिष्य स्वामी नारायणदास कृत श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका अबिहड़ का अँग तथा साखी भाग समाप्त: ॥*
(क्रमशः)

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