#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*देषौ भाई ब्रह्माकाश समानं ।*
*परब्रह्म चैतन्य ब्योम जड*
*यह बिशेषता जानं ॥(टेक)*
*दोऊ ब्यापक अकल अपरमिति*
*दोऊ सदा अषंड ।*
*दोऊ लिपैं छिपैं कहुं नांहीं*
*पूरन सब ब्रह्मण्ड ॥१॥*
*ब्रह्म मांहिं यह जगत देषियत*
*ब्यौम मांहिं घन यौंहीं ।*
*जगत अभ्र उपजैं अरु बिनसैं*
*वैहैं ज्यौं के त्यौं हीं ॥२॥*
भाई ! इस ब्रह्म को आकाश के तुल्य(खं ब्रह्म) समझो । यहाँ ब्रह्म चैतन्य है तथा आकाश जड़ है –यही विशेषता जाननी चाहिये । अन्यथा दोनों अखण्ड हैं, निष्कल(कला रहित) हैं, परिणामरहित हैं । ये दोनों ही न कहीं लिप्त होते हैं, न कहीं छिपते हैं । ये तो सदा अखण्डपूर्ण ब्रह्म है ॥१॥
ब्रह्म में इस जगत् को वैसे ही समझो जैसे आकाश में मेघ दीखते हैं । जैसे वहाँ मेघ उत्पन्न विनष्ट होते रहते हैं, परन्तु आकाश यथास्थित रहता है; वैसे ही जगत् उत्पन्न विनष्ट होता रहता है; परन्तु चैतन्य यथास्थित रहता है ॥२॥
(क्रमशः)

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