#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*राम निरञ्जन की बलिहारी ।*
*रूप रेष कछु दृष्टि परै नहिं*
*कौंन सकै निरधारी ॥(टेक)*
*जाकौ कीयौ जगत नाना बिधि*
*यह माया बिस्तारी ।*
*कीमति कोऊ कहै कहा कहि*
*नहिं हलुका नहिं भारी ॥१॥*
*सब घट ब्यापक अन्तरजामी*
*चेतनि शक्ति तुम्हारी ।*
*सुंदर शक्ति काढि जब लीनी*
*रूसि रहे नर नारी ॥२॥*
में उस निरञ्जन निराकार भगवान् का कृतज्ञ हूँ जिनके शरीर की रूप या रेखा कुछ भी दृष्टि में नहीं आती । तब उसके रूप या आकार का कौन निर्धारण करे कि वह ऐसा है ॥टेक॥
उनके कारण ही, इस समस्त जगत् का तथा उसकी माया का इतना लम्बा चौड़ा विस्तार दिखायी दे रहा है । न इसका कोई मूल्याङ्कन ही कर सकता है, न कोई इसके हल्केपन या भारीपन का ही निर्धारण कर सकता है ॥१॥
हे प्रभु परमात्मा ! हे अन्तर्यामी ! प्रत्येक के शरीर में आप की चेतन शक्ति(सामर्थ्य) ही व्यास है । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं – यह शक्ति जब शरीर से निकल जाती है तब सभी प्राणियों की उस शरीर के प्रति पूर्ण उपेक्षा की जाती है ॥२॥
(क्रमशः)

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