रविवार, 14 जुलाई 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।*
*अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

परमात्मा की बड़ी कृपा है कि सपने कभी सफल नहीं हो पाते। सफल हो जायें तो मनुष्य परमात्मा से सदा के लिए वंचित रह जाएगा।परमात्मा की बड़ी अनुकंपा है कि इस जगत में वस्तुत: सफल नहीं हो पाते; सफलता का भ्रम ही होता है, असफलता ही हाथ लगती है ! हीरे—जवाहरात दूर से दिखाई पड़ते हैं, हाथ में आते— आते सब राख के ढेर हो जाते हैं। यह अनुकंपा है कि इस जगत में किसी को सफलता नहीं मिलती। इसी विफलता से, इसी पराजय से परमात्मा की खोज शुरू होती है। इसी गहन हार से, इसी पीड़ा से, इसी विकलता से सत्य की दिशा में आदमी कदम उठाता है।
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अगर सपने सच हो जायें तो फिर सत्य को कौन खोजे? सपने सपने ही रहते हैं, सच तो होते ही नहीं, सपने भी नहीं रह जाते, टूट कर बिखर जाते हैं, खंड—खंड हो जाते हैं। चारों तरफ टुकड़े पड़े रह जाते हैं। यह तो शुभ हुआ कि होना चाहते थे सफल गृहस्थ, न हो पाये। कौन हो पाता है? सफल गृहस्थ देखा? अगर सफल गृहस्थ देखा होता तो बुद्ध घर छोड़ कर न जाते। तो महावीर घर छोड़ कर न जाते। सफल गृहस्थ देखा कभी? आशाएं है।
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जब किन्हीं दो व्यक्तियों की शादी होती है,स्त्री—पुरुष की, तो पुरोहित कहता है कि सफल होओ ! मगर कोई कभी हुआ? यह तो शुभाकांक्षा है। यह तो पुरोहित भी नहीं हुआ सफल ! यह बड़े —बूढ़े देते हैं आशीर्वाद कि सफल होओ बेटा ! इनसे तो पूछो कि आप सफल हुए? कोई सफल हुआ संसार में? सिकंदर भी खाली हाथ जाता है ! अच्छा हुआ गृहस्थी में सफल न हो सके, अन्यथा घर मजबूत बन जाता; फिर मंदिर खोजते ही न।
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अच्छा हुआ कि प्रसिद्धि में सफल न हुए; लेखक—पत्रकार बन जाते तो अहंकार मजबूत हो जाता। अहंकार जितना मजबूत हो जाये उतना ही परमात्मा की तरफ जाना मुश्किल हो जाता है। पापी भी पहुंच जाये, अहंकारी नहीं पहुंचता है। पापी भी थोड़ा विनम्र होता है, कम से कम अपराध के कारण ही विनम्र हो —गया होता है कि मैं पापी हूं। लेकिन जिसने दो —चार किताबें लिख लीं, अखबार में नाम छप जाता है—लेखक हो गया, कवि हो गया, चित्रकार, मूर्तिकार—वह तो अकड़ कर खड़ा हो जाता है। कभी खयाल किया कि अक्सर लेखक, चित्रकार, कवि नास्तिक होते हैं—अक्सर ! पत्रकार अक्सर क्षुद्र बुद्धि के लोग होते हैं। उनके जीवन में कोई विराट कभी महत्वपूर्ण नहीं हो पाता। बड़ी अकड़.....!
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अच्छा हुआ, हारे ! हार में परमात्मा की जीत है। मिटने में ही उसके होने की गुंजाइश है। फिर राजनीतिज्ञ होना चाहते थे—वह तो बड़ी कृपा है उसकी कि न हो' पाये। क्योंकि सुना नहीं कि राजनीतिज्ञ कभी स्वर्ग पहुंचा हो। और राजनीति स्वर्ग की तरफ ले भी नहीं जा सकती। राजनीति का पूरा ढांचा नारकीय है। राजनीति की पूरी दाव—पेंच, चाल—कपट—सब नर्क का है।
नर्क का एक बड़े से बड़ा कष्ट यह है कि वहां सब राजनीतिज्ञ इकट्ठे मिल जायेंगे। 
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आग—वाग से मत डरना—वह तो सब पुरानी कहानी है। आग तो ठीक ही है। आग में तो कुछ हर्जा नहीं है बड़ा। लेकिन सब तरह के राजनीतिज्ञ वहां मिल जायेंगे। उनके दाव—पेंच में सताये जाओगे। नर्क का सबसे बड़ा खतरा यह है कि सब राजनीतिज्ञ वहां हैं। हालांकि जब भी कोई राजनीतिज्ञ मरता है, कहते हैं, स्वर्गीय हो गये। अभी तक सुना नहीं कि कोई राजनीतिज्ञ कभी स्वर्ग गया हो?

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