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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*वैरी पंच निमष नहिं न्यारे, रोक रहे जम काल ।*
*हा जगदीश ! दास दुख पावै, स्वामी करहु सँभाल ॥*
*तुम्ह बिन राम दहैं ये द्वन्दर, दसौं दिशा सब साल ।*
*देखत दीन दुखी क्यों कीजे, तुम हो दीन-दयाल ॥*
*निर्भय नाम हेत हरि दीजे, दर्शन पर्सन लाल ।*
*दादू दीन लीन कर लीजे, मेटहु सब जंजाल ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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रज्जब सदगुरु शैल१ तैं, शबद शिला आवंत२ ।
मन समुद्र शिर पाजकर३, रोस रावणहिं हंत ॥८१॥
सदगुरु रूप पर्वत१ से शब्द रूप शिलायें आती२ हैं, उनसे मनरूप समुद्र पर सेतु३ बांध करके क्रोध रूप रावण को मार ।
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शब्द शिला रंकार जटि, मन समुद्र शिर पाज ।
रज्जब रावण रोस हत, काया कंचनी१ राज ॥८२॥
शब्द रूप शिलाओं में राम मंत्र का बीज "राँ" जटित करके मन रूप समुद्र पर सेतु बाँध तथा क्रोध रूप रावण को मार कर कायारूप सुवर्णपुरी१ लंका राज कर ।
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आतम रथ है राम, आतम का रथ देह ।
ये रथ देखहु सागड़ी१, परम सयानप येह ॥८३॥
राम का रथ आत्मा है, आत्मा का रथ शरीर है, हे रथी१ ! इन रथों को देखो, इनको ठीक रखना है, यही परम चतुरता है ।
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जैसी संतति१ शक्ति२ सौं, तैसी शिव३ सौं होय ।
तो रज्जब रामहिं मिलै, कदे न दीसै दोय ॥८४॥
जैसी प्रीति संतान१ और माया२ से होती है, वैसी परमात्मा३ से हो तो राम को ही प्राप्त होगा, उसे कभी द्वैत नहीं भासेगा ।
(क्रमशः)

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