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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१२ - करुणा विनती । पँजाबी त्रिताल
तूँ जनि१ छाड़े केशवा, मेरे और२ निवाहनहार हो ॥टेक॥
अवगुण मेरे देखकर, तू ना कर मैला मन ।
दीनानाथ दयाल है, अपराधी सेवक जन हो ॥१॥
हम अपराधी जनम के, नख शिख भरे विकार ।
मेट हमारे अवगुणाँ, तूँ गरवा३ सिरजनहार हो ॥२॥
मैं जन बहुत बिगारिया, अब तुम ही लेहु संवार ।
समर्थ मेरा साँइयां, तूँ आपै आप उधार हो ॥३॥
तूँ न विसारी केशवा, मैं जन भूला तोहि ।
दादू को ओर२ निवाह ले, अब जनि छाड़े मोहि हो ॥४॥
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वियोग जन्य दु:खपूर्वक विनय कर रहे हैं - मेरे को अन्त तक निवाहने वाले केशव ! आप मुझे मत१ छोड़ देना । आप तो मेरे को अन्त२ तक निवाहने वाले हो, अन्य कोई मेरा भार वहन करने वाला नहीं है ।
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("जो हरि, और कोउ हितु पाऊँ ।"- सूरदास) मेरे दोष देखकर आप अपने मन को मेरे से उपराम न करना । यद्यपि सेवक जन अपराधी होते हैं, तो भी हे दीनानाथ ! आप तो दयालु ही रहते हैं ।
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हम तो जन्म - जन्म के अपराधी हैं, नख से शिखा पर्यन्त विकारों से भरे रहने के कारण तुच्छ हैं, किन्तु आप तो सब प्रकार महान्३ हैं ।
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अत: हे विश्वकर्त्ता ! मेरे दोषों को नष्ट करिये । मैंने दोषों के द्वारा बहुत कुछ बिगाड़ लिया है । अब आप ही सुधार करके मुझे अपनाइये । हे मेरे समर्थ प्रभो ! आप अपने जनवत्सल स्वभाव के द्वारा ही मेरा उद्धार करो ।
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हे केशव ! यद्यपि मैं सेवक आपको भूल गया हूं, तो भी आप मुझे मत भूलना । अब मुझे अवश्य अन्त२ तक निभाना, छोड़ना नहीं ।
(क्रमशः)

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