#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*जोगनि होइ रही जग मोहन कारनै ।*
*तुम काहे न दरसन देहु करौं तन बारनै ॥६॥*
*मेरौ षून षता अब कौंन कहौं किन रावरे ।*
*तेरी सूरति की बलि जाउं मेरे गृह आवरे ॥७॥*
*सुन्दर बिरहनि के पीव गहर न लाइये ।*
*मोहि मिहरि मया करि बेगि दरस दिषाइये ॥८॥*
हे जगमोहन ! अब में, आपके लिये, जोगिन(वैरागिन) बन गयी हूँ । आप मुझे दर्शन क्यों नहीं देते ! मैं आप पर अपना यह शरीर न्योछावर कर दूँगी ॥६॥
ओ मेरे राजा ! मैं अब अपना अपराध किससे कहूँ ? आप पर मैं बलिहारी जाती हूँ, आप मेरे घर पधारिये ॥७॥
हे मुझ विरहिणी के पतिदेव ! मुझ पर इतनी कठोरता न दिखाइये । अपितु, मुझ पर दया दिखाते हुए मुझ को शीघ्र ही दर्शन दीजिये ॥८॥
(क्रमशः)

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