गुरुवार, 29 अगस्त 2019

= ३० =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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३० - उपदेश चेतावनी । त्रिताल
का जिवना का मरणा रे भाई,
जो तैं राम न रमसि अघाई ॥टेक॥
का सुख सँपति छत्रपति राजा,
वनखँड जाइ बसे किहिं काजा ॥१॥
का विद्या गुन पाठ पुरानाँ,
का मूरख जो तैं राम न जानाँ ॥२॥
का आसन कर अहनिशि जागे,
का फिर सोवत राम न लागे ॥३॥
का मुक्ता, का बँधे होई,
दादू राम न जाना सोई ॥४॥
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*यथार्थ ब्रह्मज्ञान से ही जीवन की सफलता है यह बता रहे हैं -* 
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हे भाई ! यदि तू राम के स्वरूप में अरस - परस होकर अद्वैतानन्द से तृप्त नहीं हुआ तो अधिक जीने में और मरणे में क्या विशेषता है ? 
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छत्रपति राजा होकर सँपत्ति का सुख लिया तो भी क्या तृप्ति होती है ? यदि राज्यादि से तृप्ति हो जाती तो राजा लोग किस लिये वन में जाकर बसे थे ? 
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हे अज्ञ ! यदि तूने राम को नहीं जाना तो तेरे अधिक विद्या, गुनने, कला सीखने और पुराण - पाठ करने से क्या लाभ है ? 
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यदि राम के चिन्तन में नहीं लगे तो सिद्धि प्राप्ति के लिये आसन लगा कर दिन - रात जागने से या सोने से क्या लाभ है ? 
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जिनने राम को अद्वैत रूप से नहीं जाना, उनकी मुक्तता और बद्धता में क्या विशेषता है ? वे तो दोनों ही समान हैं, अर्थात् वाणी मात्र से अपने को मुक्त कहने वाला भी बद्ध ही है ।
(क्रमशः)

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