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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३२ - मृगोक्ति उपदेश । झपताल
मोह्यो मृग देख वन अँधा,
सूझत नहीं काल के फँधा ॥टेक॥
फूल्यो फिरत सकल वन माँहीं,
शिर साँधे शर सूझत नाँहीं ॥१॥
उदमद१ मातो वन के ठाट,
छाड़ चल्यौ सब बारह२ बाट ॥२॥
फँध्यो न जाने वन के चाइ३,
दादू स्वाद बंधानो आइ ॥३॥
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मृग के दृष्टांत से उपदेश कर रहे हैं -
विचार नेत्रों से हीन जीव रूप मृग, सँसार - वन को देखकर मोहित हो रहा है । इसे काल का कर्म - फल रूप जाल का फँदा नहीं दीख रहा है ।
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यह प्रसन्न हुआ वन के सँपूर्ण विषय - वृक्षों में विचर रहा है, किन्तु इसके पीछे कालरूप व्याध, इसके शिर पर आयु समाप्ति रूप बाण सँधान किये हुये आ रहा है, वह इसे नहीं दीखता ।
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यह स्त्री - पुत्रादि रूप वृक्षों द्वारा सँसार - वन की सजावट देखकर मतवाले के समान उन्मत्त१ हो रहा है और अपने कल्याण के सभी साधनों को छोड़कर, बहिर्मुख२ हुआ पतन की ओर जा रहा है ।
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यह सँसार - वन के विषय - वृक्षों को खाने की आशा३ में जाल नहीं दिखने से अपने को फँदे में आया हुआ नहीं समझता किन्तु विषय स्वाद के कारण ही कर्म - बँधन में आ बंधा है ।
(क्रमशः)

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