शनिवार, 31 अगस्त 2019

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卐 सत्यराम सा 卐
*जहँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ ।*
*दादू वासा प्राण का, जहँ पहली रह्या समाइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)* 
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सप्रेम जिसका स्मरण करे उसी का रूप हो जाता है -*
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जिहिं सप्रेम सुमरण करत, हो उसका ही स्वरूप ।
सुमरण करके भैंस का, बना भैंस ही रूप ॥१००॥
एक मनुष्य एक संत के पास गया और बोला - "भगवन् ! मुझे भजन करने की रीति बतलावें ?" संत ने उसे नाना रीति से भजन करना बताया किन्तु उसका मन नहीं लगा ।
तब संत ने उससे पूछा - "तेरा सबसे अधिक प्रेम किसमें है ?" उसने कहा - "मेरी भैंस में है ।" 
संत - अच्छा, फिर तू कुटिया में बैठ कर भैंस का ही स्मरण कर ।" वह वैसा ही करने लगा । 
कुछ दिन बाद एक दिन स्मरण में बैठे हुये उसको संत ने सहसा पुकारा बाहर आने को कहा, वह बोला -"कुटिया का द्वार चौड़ा कम है, मेरे सींग अड़ेंगे, मुझ से नहीं निकला जायेगा ।
संत ने कहा - "ठीक है किन्तु तू अपने सिर को टेढ़ा करके निकल आ ।" तब उसने इस प्रकार सिर टेढ़ा किया जिससे सींग, द्वार की ऊंचाई और निचाई की ओर हो जाय । फिर वह निकल कर बाहर आ गया । 
तब संत ने समझाया कि - "जिस प्रकार तूने भैंस का स्मरण किया उसी प्रकार भगवान का कर ।" उसके भी समझ मे आ गया । 
इससे सूचित होता है कि सप्रेम जिसका स्मरण किया जाता है तब अन्त में स्मरणकर्ता उसी का रूप हो जाता है । महाराज पुण्डरीकजी स्थूल शरीर से ही चतुर्भुज रूप हो गये थे यह कथा पुराण में प्रसिद्ध है ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
######## सत्य राम सा

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