बुधवार, 28 अगस्त 2019

= २९ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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२९ - उपदेश चेतावनी । त्रिताल
मैं मैं करत सबै जग जावै, अजहूं अँध न चेते रे ।
यह दुनिया सब देख दिवानी, भूल गये हैं केते रे ॥टेक॥
मैं मेरे में भूल रहे रे, साजन सोइ विसारा ।
आया हीरा हाथ अमोक, जन्म जुवा ज्यों हारा ॥१॥
लालच लोभैं लाग रहे रे, जानत मेरी मेरा ।
आपहि आप विचारत नाँहीं, तूँ काको को तेरा ॥२॥
आवत है सब जाता दीसे, इनमें तेरा नाँहीं ।
इन सौं लाग जन्म जनि खोवे, शोधि देख सचु१ माँहीं ॥३॥
निहचल सौं मन माने मेरा, सांई सौं बन आई ।
दादू एक तुम्हारा साजन, जिन यहु भुरकी लाई ॥४॥
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उपदेश द्वारा सावधान कर रहे हैं - 
मैं धनी, मैं बली, आदि अहँकार करते हुये जगत् के सभी प्राणी काल के मुख में जा रहे हैं, यह देख करके भी अभी तक मदाँध प्राणी सचेत नहीं होते । यह सब सँसार पागल है । इसे देखकर कितने ही विचारशील लोग भी अपना हित साधन करना भूल गये हैं । 
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"मैं और मेरे" अभिमान में आकर अपना जो सच्चा स्वामी परमात्मा था, उसके उपकार को भूलकर उसे भी भूल रहे हैं । यह मनुष्य जन्म रूप अमूल्य हीरा हाथ में आया था किन्तु इसे भी जैसे जुआरी अपने धन को जुआ में हारता है, वैसे ही विषयों में खो रहा है । 
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लोभ - लालच में लग रहे हैं और जानते हैं - "यह नारी मेरी है, यह धन - धाम मेरा है", किन्तु अपने हृदय में स्वयँ विचार नहीं करते कि तू किसका है और तेरा कौन है ! 
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ये सब धनादि तो आते हैं और जाते हुये भी दीख रहे हैं । इनमें तो तेरा कुछ भी नहीं है । यदि तेरे हों तो तेरे हाथ से क्यों चले जाते हैं ? इनमें आसक्त होकर अपना जन्म व्यर्थ ही क्यों खोता है ? विचार द्वारा खोज करके देख, परम सुख१ तो तेरे भीतर ही है । 
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हमारा मन तो उस निश्चल परमात्मा के भजन में ही सुख मानता है, उसी से हमारी सब बात ठीक बनी है । तुम सब भी याद रक्खो, जिस परमात्मा ने यह माया - मोहनी डाली है, वही तुम्हारा सच्चा मित्र है, अन्य सब तो स्वार्थ के ही साथी हैं ।
(क्रमशः)

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