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*सांई सरीखा सुमिरण कीजे, सांई सरीखा गावै ।*
*सांई सरीखी सेवा कीजे, तब सेवक सुख पावै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
*पद सेवक स्वामी के पीछे रहते हैं -*
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पद सेवक निज स्वामी के, पीछे रहत आप ।
इस कारण हो बढा था, जगतसिंह सुप्रताप ॥१२१॥
राजा आनन्दसिंह का पुत्र जगतसिंह भगवान की पाद सेवक भक्ति करते थे । वे कभी राजधानी से बाहर जाते तब भगवान की पालकी उनके आगे-आगे चलती थी और वे सेवक के समान पीछे-पीछे चला करते थे । जब कभी युद्ध का प्रसंग आ पड़ता था तब भी भगवान को ही सेनापति तथा अधिपति मान करके युद्ध करते थे । भगवान की संपूर्ण सेवा भी अपने हाथों से ही करते थे ।
शाहजहानाबाद में यशवन्तसिंह जोधपुर के और जयसिंह जयपुर के राजाओं ने उनके दर्शन की अभिलाषा की और प्रात: दो तीन घड़ी रात रहते ही उनके भगवत सेवा के जल लाने के मार्ग में जा बैठे थे । जगतसिंह जी सशत्र सैंकड़ों सैनिकों के साथ शिर पर जल का कलश रखे तथा मुख से भगवान का नाम उच्चारण करते हुए नंगे पैरों से आ रहे थे ।
दोनों राजाओं ने उनकी ऐसी भक्ति देख कर उनके चरणों में प्रणाम किया तथा अपने को उनके दर्शन से धन्य माना । इससे सूचित होता है कि पद-सेवक भक्त सदा भगवान के पीछे रहता है, और सब सेवा अपने हाथों से ही करता है।
##श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु #श्री नारायणदास जी
###### सत्यराम सा

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