卐 सत्यराम सा 卐
*दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं,**बालक ज्यूं पय पीवे ।*
*ऐसे अन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग-जुग जीवे ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*स्मरण रहस्य को विरले संत ही जानते है -*
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जानत सुमरण भेद को, साधु विरला कोय ।
वैरागी लख नाम ले, दादू सम नहिं होय ॥९२॥
आमेर नगर में एक वैरागी साधु ने सन्तप्रवर दादूजी से प्रश्न किया - "हे भगवन् ! मैं प्रतिदिन एक लाख नाम जप करता हूं तो भी मुझे आपके समान लाभ नहीं हुआ, क्यों कि मुझे आपके समान सन्त कोई नहीं मानते ।"
यह सुनकर दादूजी बोले - "आपके और मेरे स्मरण में कुछ भेद है, वास्तव नाम स्मरण इसे कहते हैं -
"अलख नाम अंतरि कहे, सब घट हरि-हरि होय ।
दादू पाणी लूंण ज्यों, नाम कहावे सोय ॥"
अर्थात भीतर निरंतर रोम-रोम से स्मरण होता रहे जैसे जल और नमक एक हो जाते हैं उसी प्रकार नाम और मन में भेद नहीं रहे तब ही वास्तव नाम स्मरण कहलाता है । इससे सूचित होता है कि नाम स्मरण के रहस्य को कोई बिरले संत ही जानते हैं ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
######## सत्य राम सा

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