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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*तिनका रे यह औजूद है सो तैं महल बनाया ।*
*नव दरवाजे साजि कैं दसवैं कपाट लगाया ॥२॥*
*आपन रे बैठा गोपि ह्वै ब्यापक सब घट मांहीं ।*
*करता हरता भोगता लिपै छिपै कछु नांहीं ॥३॥*
*ऐसी रे तेरी साहिबी सो तूं ही भल जांनै ।*
*सिफति तुम्हारी सांइया सुन्दरदास बषानै ॥४॥*
उनकी इस विशेषता के सहारे से ही आपने यह सृष्टि का इतना लम्बा चौड़ा प्रासाद(महल) बनाया । इसमें अपने नौ द्वार बनाकर दशम द्वार पर कपाट(फाटक =अवरोधक) लगा दिये ॥२॥
तथा आप स्वयं रक्षक के रूप में वहाँ सर्वत्र व्यापक रहते हुए विराज गये; क्योंकि आप ही यहाँ कर्ता, हर्ता(नाशक) भोक्ता के रूप में दिखायी देते हैं । आपके लिये यहाँ कुछ गुप्त भी तो नहीं है ॥३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं इस सृष्टि पर आपका ऐसा स्वामित्व आप ही यथार्थ रूप से जानते हैं ॥४॥१९८॥
(क्रमशः)

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