सोमवार, 30 सितंबर 2019

= *सजीवन का अंग ८५(५/८)* =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड ।*
*दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सजीवन का अंग ८५*
सब सौ सुरति१ उठाय२ कर, जो पैसै प्रभु माँहिं । 
जन रज्जब सो काल कर३, क्यों ही आवै नाँहिं ॥५॥ 
जो सब से अपनी वृति१ को हटा२कर, ब्रह्म में प्रवेश करता है, वह किसी प्रकार भी काल के हाथ३ में नहीं आ सकता । 
रज्जब साधू शून्य१ ह्वै, शीश सब हुं तल देय । 
अन्तक२ भय उसको नहीं, अकल आप में लेय ॥६॥ 
जो संत सर्व विकारों से रहित होकर आकाश१ के समान सम हो जाता है और अपना अहंकार रूप शिर सबके नीचे रख देता है अर्थात सबसे छोटा बन जाता है तब उसे कला विभाग से रहित ब्रह्म अपने स्वरूप में मिला लेते हैं, इससे उसे काल२ का भय नहीं रहता । 
शून्य१ सजीवन२ उर अमर, रसना रहते माँहिं । 
जन रज्जब आँख्यों अखिल३, प्राणी मरै सु नाँहिं ॥७॥ 
जिसके हृदय में सदा जीवित१ रहने वाले ब्रह्म२ का ध्यान रहता है, जिह्वा पर अमर ब्रह्म का नाम रहता है, नेत्रों से सर्व३ रूप ब्रह्म ही दीखता है, वह प्राणी नहीं मरता ब्रह्मरूप होकर अमर हो जाता है । 
अडिग१ सुरति आठों पहर, अस्थिर२ संग अडोल३ । 
सो रज्जब रहसी सदा, साखी४ साधू बोल५ ॥८॥ 
जिस की स्थिर१ वृति अष्ट पहर स्थिर२ ब्रह्म के संग स्थिर३ रहती है अर्थात निरंतर ब्रह्माकार रहती है, वह ब्रह्मरूप होकर सदा जीवित रहेगा, इससे सन्तों के वचन५ साक्षी४ देते हैं । 
(क्रमशः)

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