सोमवार, 30 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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६१ - भेष । पँचम ताल
भेष न रीझै मेरा निज भरतार, 
तातैं कीजै प्रीति विचार ॥टेक॥
दुराचारिणी रच भेष बनावै, 
शील साच नहिं पिव को भावे ॥१॥
कंत न भावे करै श्रृंगार, 
डिंभपणैं रीझै सँसार ॥ २ ॥
जो पै पतिव्रता ह्वै है नारी, 
सो धन१ भावै पियहिं पियारी ॥३॥
पिव पहचानै, आन नहिं कोई, 
दादू सोई सुहागिनि होई ॥४॥
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प्रभु प्राप्ति में भेष कारण नहीं, यह कह रहे हैं - मेरे निजी स्वामी राम बाहर के भेष से प्रसन्न नहीं होते । अत: प्रेम भक्ति द्वारा ही उनको प्रसन्न करने का विचार कर, 
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यदि दुराचारिणी नारी श्रृंगार करके अपना भेष अच्छा बना ले तो उसमें शील, सत्य - व्रत नहीं होने से वह स्वामी को प्रिय नहीं लगती । 
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इस प्रकार भेष रूप श्रृंगार हमारे स्वामी राम को प्रिय नहीं होता । भेष - दँभ से तो साँसारिक लोग ही प्रसन्न होते हैं 
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किन्तु जो भेष रूप श्रृंगार से रहित राम रूप स्वामी का व्रत रखने वाली सँतात्मा - नारी१ है, वही सखी हम को अच्छी लगती है और राम रूप पति को प्यारी होती है । 
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जो सँतात्मा - नारी राम को ही पति रूप से पहचानती है, अन्य किसी को भी नहीं, वही सदा सुहागिनी होगी ।
(क्रमशः)

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