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*जोगिया बैरागी बाबा,*
*रहै अकेला उनमनि लागा ॥*
*आतम जोगी धीरज कंथा,*
*निश्चल आसण आगम पंथा ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २३०)
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साभार ~ Soni Manoj
# *यहां सब अकेले हैं* # √
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एकांत, मौन और ध्यान - यही तीन सूत्र हैं समाधि के ।
एकांत ! ऐसे रहो, जैसे तुम अकेले हो ।
कहीं भी रहो - ऐसे रहो, जैसे तुम अकेले हो ।
न कोई संगी है, न कोई साथी । भीड़ में भी रहो, तो अकेले रहो । परिवार में भी रहो, तो अकेले रहो । इस बात को जानते ही रहो भीतर, एक क्षण को यह सूत्र हाथ से मत जाने देना । एक क्षण को भी यह भ्रांति पैदा मत होने देना कि तुम अकेले नहीं हो, कि कोई तुम्हारे साथ है । यहां न कोई साथ है; न कोई साथ हो सकता है । यहां सब अकेले हैं । अकेलापन आत्यंतिक है । इसे बदला नहीं जा सकता । थोडी़ - बहुत देर को भुलाया जा सकता है; बदला नहीं जा सकता ।
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और सब भुलावे एक तरह के मादक द्रव्य हैं । एक प्रकार के नशे हैं । कैसे तुम भुलाते हो, इससे फर्क नहीं पड़ता । कोई शराब पीकर भुलाता है । कोई धन की दौड़ में पड़कर भुलाता है । कोई पद के लिए दीवाना होकर भुलाता है । कैसे तुम भुलाते हो, इससे फर्क नहीं पड़ता । लेकिन थोडी़ देर को भुला सकते हो । बस । और जब भी नशा उतरेगा, अचानक पाओगे : अकेले हो ।
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संन्यासी वही है, जो जानता है कि मैं अकेला हूं और भुलाता नहीं अपने अकेलेपन को । भुलाना तो दूर, अपने अकेलेपन में रस लेता है । और प्रतीक्षा करता है कि कब मौका मिल जाए कि थोडी़ देर अपने अकेलेपन का स्वाद लूं । थोडी़ देर आंख बंद करके अपने में डूब जाऊं; अकेला रह जाऊं । वही मेरी नियति है । वही मेरा स्वभाव है । उसी स्वभाव से मुझे पहचान बनानी है ।
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दूसरों से पहचान बनाने से कुछ भी न होगा; अपने से पहचान बनानी है । दूसरों को जानने से क्या होगा ? अपने को ही न जाना और सबको जान लिया, इस जानने का कोई मूल्य नहीं है । मूल में तो अज्ञान रह गया ।
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और जब तुम एकांत में रहोगे और चुप रहोगे, तो भीतर विचार कब तक चलेंगे, कब तक चलेंगे ? उनका मौलिक आधार ही कट गया । जड़ ही कट गयी । तुमने पानी सींचना बंद कर दिया । वही-वही विचार कुछ दिन तक गूंजेंगे - गूंजेंगे - गूंजेंगे; धीरे-धीरे तुम भी ऊब जाओगे, वे भी ऊब जाएंगे ।
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रोज-रोज नया कुछ होता रहे, तो विचार में धारा बहती रहती है; प्राण पड़ते रहते हैं । अब अकेले में बैठ गए, न बोलना है, न चालना है । कब तक सिर में वही विचार घूमते रहेंगे ? धीरे-धीरे मुर्दा हो जाएंगे । गिर जाएंगे । सूखे पत्तों की तरह झड़ जाएंगे । नए पत्ते तो अब आते नहीं । पुराने पत्ते एक बार झड़ गए, तो मन निर्विचार हो जाएगा । उस दशा का नाम ही ध्यान है ।
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ओशो ~ एस धम्मो सनंतनो १२
प्रवचन १२१ जागो और जिओ से संकलन ।
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