शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

= *काल का अंग ८४(३९/४२)* =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*सबको बैठे पंथ सिर, रहे बटाऊ होइ ।*
*जे आये ते जाहिंगे, इस मारग सब कोइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
रज्जब राम न सुमिरिये, मिले सकल संयोग । 
तब सुमिरोगे कौन विधि, जब वपु वायु वियोग ॥३९॥ 
इस समय सभी संयोग अनुकूलता के मिले हुये हैं तो भी राम का स्मरण नहीं करते हो फिर जब प्राण वायु और शरीर का वियोग रूप मरण होगा तब किस प्रकार स्मरण कर सकोगे ? 
विषम१ व्याधि क्यों टालिये, कठिन२ काल की चोट । 
रज्जब केशरि३ काढसी४, धाय गही हरि ओट५ ॥४०॥ 
कठोर२ काल की चोट रूप भयंकर१ व्याधि कैसे हटाई जायगी ? वह काल रूप सिंह३ शरीर से प्राणों को निकाल लेगा४, अत: भजन रूप दौड़ लगाकर प्रभु का आश्रय५ लो । 
काया माया१ भांड सब, सकल जीव को काल । 
रज्जब काढै कौन विधि, यहु अंतर गत साल ॥४१॥ 
शरीर माया और सभी ब्रह्माण्ड१ में सभी जीवों को काल खाता है, यह भीतर का दु:ख कैसे निकाला जाय ? 
चिन्ता चित कु काल है, मनहु१ मनोरथ मीच२ । 
रज्जब जाने राम बिन, यहु जौंरा३ मन नीच ॥४२॥ 
निरंजन राम के स्वरूप को जाने बिना, यह नीच मन ही यमदूत३ है, चिन्ता ही चिता और काल है, मन१ के मनोरथ ही मृत्यु२ हैं । अत: राम को जानना चाहिये । 
(क्रमशः)

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