शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

= ५८ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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५८ - रस । त्रिताल
राम रस मीठा रे, पीवै साधु सुजाण ।
सदा रस पीवै प्रेम सौं, सो अविनाशी प्राण ॥टेक॥
इहि रस मुनि लागे सबै, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
सुर नर साधू सँत जन, सो रस पीवें शेष ॥१॥
सिध साधक जोगी जती, सती सबै शुकदेव ।
पीवत अंत न आवही, ऐसा अलख अभेव ॥२॥
इहिं रस राते नामदेव, पीपा अरु रैदास ।
पीवत कबीरा ना थक्या, अजहूं प्रेम पियास ॥३॥
यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही माँहिं समाइ ।
मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥४॥
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५८ - ६० में राम - भक्ति - रस का परिचय दे रहे हैं - 
हे भाई ! राम - भक्ति - रस अति मधुर है, उसे बुद्धिमान् सँत पान करते हैं । जो प्राणी प्रेम से सदा राम - भक्ति - रस का पान करता है, वह अविनाशी हो जाता है । 
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सब मुनि, ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, इन्द्रादि देव, नर श्रेष्ठ सँत - जन भी इसके पान में लगे हैं । शेष जी भी इसी रस का पान करते हैं । 
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सिद्ध, साधक, योगी, यति, सती आदि सभी तथा परम विरक्त शुकदेव भी पान करते रहे हैं, किन्तु फिर भी इसका अन्त नहीं आता, यह ऐसा है । मन इन्द्रियों का अविषय और अद्वैत है । 
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नामदेव, पीपा और रैदास भी इसी रस में अनुरक्त रहे हैं । कबीर भी इस रस के पान करने में थके नहीं । इस समय के सन्तों को भी राम - भक्ति - रस पान की प्रेम - पूर्वक प्यास है । 
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यह मधुर - रस जिसने पान किया है, वह रस में ही समा गया है । राम - भक्त रस पान से मधुर हुआ सन्त मधुर परमात्मा में मिलकर ही रहता है, अन्य शरीरों में नहीं जाता ।
(क्रमशः)

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