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*दादू सबको पाहुणा, दिवस चार संसार ।*
*औसर औसर सब चले, हम भी इहै विचार ॥*
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साभार ~ Atul Verma
*सर्पों में वासुकि हूं नागों में शेषनाग, जलचरों में वरुण देवता हूं पितरों में पित्रेश्वर तथा शासन करने वालों में यमराज हूं।* यह प्रतीक बहुत कीमती है; वैसा ही, जैसा कामदेव, वैसा ही यमराज। इसे हम थोड़ा समझ लें।
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शासन करने वालों में यमराज, मृत्यु का दूत, मृत्यु का शासक! शासन करने वालों में कृष्ण को कोई और न सूझा ! बड़े शासक हो गए हैं। पृथ्वी ने बड़े शासक देखे हैं। स्वर्ग भी शासकों को जानता है। लेकिन कृष्ण को यमराज क्यों शासकों में श्रेष्ठ मालूम पड़ा? कुछ कारण हैं।
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एक, इस जगत में मृत्यु के सिवाय और कुछ भी निश्चित नहीं है। इस जगत में अगर कोई एक चीज सुनिश्चित है, तो वह मृत्यु है। बाकी सब चीजें अनिश्चित हैं। हो भी सकती हैं, न भी हों। मृत्यु होगी ही। मृत्यु न हो, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता।
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जीवन में बाकी सब अनिश्चित है। जीवन में सब ऐसा है, जैसे कोई कागज की नाव समुद्र की लहरों पर कहीं भी डोल रही हो। कहीं भी जा सकती है; पूरब भी जा सकती है, पश्चिम भी जा सकती है, बड़ी लहरों पर, छोटी लहरों पर। यह नाव कहीं भी डोल सकती है। तरंगों के हाथ में सब अनिश्चित है। एक बात सुनिश्चित है कि यह नाव कागज की डूबेगी। उतनी बात निश्चित है। और वह निश्चय बदला नहीं जा सकता। मृत्यु सर्वाधिक सुनिश्चित तथ्य है।
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इसलिए कृष्ण कहते हैं, शासकों में मैं यमराज हूं। क्योंकि उसके शासन में जरा भी शिथिलता नहीं है, जरा भी अपवाद नहीं है। सब चीजों में अपवाद हो सकता है; उसके शासन में अपवाद नहीं है। उसका शासन निरपवाद है। कानून वहां पूरा है, उसमें रत्तीभर फर्क नहीं है।
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दूसरी बात, एक आदमी अमीर हो सकता है, एक गरीब हो सकता है। एक आदमी बुद्धिमान हो सकता है, एक आदमी बुद्धिहीन हो सकता है। एक आदमी सुंदर हो सकता है, एक आदमी असुंदर हो सकता है। हम चेष्टा करके कल सारी संपत्ति बांट दें, सभी आदमियों के पास बराबर संपत्ति हो जाए, तब भी दो बराबर संपत्ति वाले आदमियों का सुख बराबर नहीं होता। हम संपत्ति बांट दें, तो हम संपत्ति को भूल जाएंगे, सौंदर्य पीड़ा देने लगेगा। बुद्धि पीड़ा देगी। कोई ज्यादा बुद्धिमान होगा, कोई कम बुद्धिमान होगा।
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जीवन में समानता असत्य है, होती ही नहीं। सोशलिज्म एक सपना है, जो कभी पूरा नहीं होता, और न कभी पूरा हो सकता है। लेकिन एक सुखद सपना है। देखने में मजा आता है। समाजवाद कभी पूरा नहीं हो सकता है जीवन में, क्योंकि जीवन असमानता है। सब तरह से जीवन असमान है। दो व्यक्ति जरा भी समान नहीं हैं। प्रकृतिगत एक—एक व्यक्ति अलग—अलग असमान है। सिर्फ जगत में एक ही सोशलिज्म निश्चित है, वह मृत्यु का समाजवाद है। मृत्यु के समक्ष सब समान है।
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जीवन में सब असमान है, मृत्यु के समक्ष सब समान है। गरीब और अमीर, बुद्धिमान और मूढ़, सुंदर और असुंदर, सफल और असफल, स्त्री और पुरुष, बच्चे और बूढ़े, काले और गोरे, नीग्रो और अंग्रेज, कोई भी—मृत्यु इस जगत में अब तक पाई गई एकमात्र सोशलिस्टिक डिक्टेटरशिप है, एकमात्र समाजवादी तंत्र उसी के पास है। वहां सब समान है।
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मृत्यु सबको समान कर देती है। उसका शासन पक्षपात नहीं मानता। अमीर यह नहीं कह सकता कि थोड़ी देर रुक, क्योंकि मैं अमीर हूं। अभी थोड़ी देर से आना, क्योंकि इस वक्त मेरी पार्टी हुकूमत में है ! अभी फुरसत नहीं मिलने की, क्योंकि अभी मैं मिनिस्टर हूं। नहीं, यह कोई भी उपाय नहीं है। गरीब भिखारी हो कि सम्राट हो, हारा—पराजित आदमी हो कि विजेता हो, मृत्यु के समक्ष पक्षपात नहीं है।
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इसलिए कृष्ण कहते हैं, शासकों में मैं यमराज। न कोई पक्षपात है, न कोई अनिश्चितता है; न कोई भेदभाव है । हम आर्थिक समानता दुनिया पर थोप सकते हैं, लेकिन भीतर सब असमान होगा। असल में समानता एक थोपी हुई चीज है, क्योंकि व्यक्ति न समान पैदा होते, न समान जीते; बस समान मरते हैं।
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मृत्यु का शासन इस अर्थ में, शायद किसी भी और शासन से तुलना नहीं किया जा सकता।
गीता दर्शन भाग–5,
अध्याय—10, OSHO

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