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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।*
*भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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उपरामी के विषय से, मिलता नहीं आराम ।
दुर्गन्धी से पूर्ण कहा, स्वच्छ भूप का धाम ॥२३७॥
एक राजा एक उपरामी संत के पास जाया जाते थे । एक दिन राजा के बहुत आग्रह करने पर वे राजमहल मे गये । संपूर्ण रमणीय भोगों से संयुक्त राजमहल में थोड़ी देर ठहर कर व्याकुल से होकर बोले- राजन ! हमको शीध्र हमारे आश्रम पर पहुँचा दो ।
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राजा - भगवन् अभी तो आप पधारे ही हैं इतनी शीध्रता क्यों कर रहे हैं ?
संत - यह महल दुर्गन्ध से भरा हुआ है इसलिये मुझ से ठहरा नहीं जा सकता ।
राजा - यह तो सुगन्ध से पूर्ण है यहा दुर्गन्ध कहाँ है ?
संत - तुम्हें नहीं आती ।
राजा - दुर्गन्ध होती तो अवश्य आती ।
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संत - अच्छा थोड़ी दूर मेरे साथ चलो, तो इसका उत्तर दूंगा । संत राजा को चमारों के मुहल्ले में ले गये । दुर्गन्ध के मारे राजा की नाक फटने लगी ।
राजा बोला - भगवन् यहां तो बड़ी दुर्गन्ध आती है यहां से शीध्र चले ।
संत - यहां दुर्गन्ध कहां है ? यहां के सब लोगों को तो नहीं आती ।
राजा - ये तो रात दिन इसी दुर्गन्ध में रहते हैं इसलिये इन्हें नहींही आती है ।
संत - ठीक, इसी प्रकार तुम भी रात दिन भोगों से पूर्ण महल में रहते हो इसलिये तुम्हें भोगों में दुर्गन्ध नहीं आती । किन्तु उपराम व्यक्ति को आती है ।
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उपरामी को भोगों से सुख के स्थान में उल्टा दु:ख ही होता है ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्य राम सा ###

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