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*दादू दृष्टैं दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ ।*
*समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥*
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साभार ~ Soni Manoj
*# धर्म : विचार नहीं उपचार #*
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धर्म के नाम पर विक्षिप्त प्रश्नों और उत्तरों का तांता लगा रहा है । प्रश्न पूछने वाले तो ठीक हैं, लेकिन उत्तर देने वाले भी आखिर मिल ही जाते हैं । शायद ऐसा सोचा जाता है कि जब प्रश्न पूछा जा सकता है तो उत्तर भी होगा ही । ऐसे एक शाब्दिक खिलवाड़ पैदा हो गया है, जिसकी पहुंच और गहराई शब्दों से ज्यादा गहरी नहीं है । शब्दों के शतरंज से शास्त्र भरे पडे़ हैं । और शब्दों की भाषागत संगति ही सत्य की उपलब्धि समझ ली जाती है ।
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भाषा मनुष्य निर्मित है, उसके नियम मनुष्य-निर्मित है, उनकी पहुंच मनुष्य की सीमित बुद्धि से ज्यादा ऊंची न है, न हो सकती है । तर्कयुक्तता भी मनुष्य की बुद्धि की सीमा के बाहर कोई अर्थ नहीं रखती है । वह सब भी खेलों में तय किये गये नियमों से ज्यादा नहीं है । उसमें न तो कोई अनिवार्यता है और न स्वयं के बाहर उसकी कोई प्रामाणिकता या सार्थकता ही है ।
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मनुष्य सत्य की खोज में जिस खेल में उलझ जाता है, वह खेल है अनुमान का । अनुमान पुराना प्रश्न तो हल नहीं करते, नये प्रश्न जरूर खडे़ कर देते हैं । और नये प्रश्नों के उत्तर में नये अनुमान करने होते हैं, फिर ये अनुमान और नये प्रश्न खडे़ कर देते हैं । ऐसे एक चक्र और जाल पैदा हो जाता है । इस चक्र और जाल से धर्म का कोई भी सम्बन्ध नहीं है ।
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परमात्मा की कल्पना और अनुमान में उर्वर मस्तिकों ने क्या नहीं किया है । स्वर्ग और नरक की कल्पनाएँ पैदा करने वाले लोग निश्चय ही क्षमताशाली कवि रहे होंगे ! और मोक्ष के चित्र बनाने वाले चित्रकारों की प्रतिभा पर कौन संदेह कर सकता है ? और दार्शनिकों की बुद्धिमत्ता का तो कहना ही क्या है ! उन्होंने तो अपने तर्कजाल से नयी सृष्टियों को ही जन्म दे डाला है । लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन सब उर्वरक और स्वप्नसर्जक दिशाओं से धर्म का कोई भी नाता नहीं है । धर्म की दिशा और ही है ।
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वह ज्ञात से अज्ञात का अनुमान नहीं है । वह ज्ञात के आधार पर अज्ञात की मनोसृष्टि नहीं है । वह तो ज्ञात(नोन) से मुक्ति है ताकि चेतना अज्ञात(अननोन) में प्रवेश कर सके । क्योंकि ज्ञात से अज्ञात नहीं जाना जा सकता है । वह तो तभी प्रकट होता है जब कि ज्ञात विदा हो जाता है । ज्ञात का सेतु अज्ञात से जोड़ता नहीं तोड़ता है ।
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अज्ञात का न विचार हो सकता है, न अज्ञात की कल्पना हो सकती है, न अज्ञात का अनुमान ही हो सकता है । क्योंकि वैसा सब विचार, सब कल्पना, सब अनुमान ज्ञात का ही विस्तार होगा । वह ज्ञात का ही रूपान्तर होगा । वह मूलतः नयी वेशभूषा में ज्ञात ही होगा । ऐसे उससे अज्ञात को जानने का भ्रम पैदा होता है, लेकिन वह अज्ञात नहीं है । और सत्य अज्ञात है, परमात्मा अज्ञात है । स्वयं की सत्ता अज्ञात है, जीवन अज्ञात है । इस अज्ञात को जानने की आंख ही तो धर्म है ।
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धर्म जब पतित होता है तो उसके पतन का मार्ग होता है ----- काल्पनिक ऊहापोह, काल्पनिक विचार । अंधे आदमी को निश्चित ही प्रकाश के सम्बन्ध में बडी़ सूझें आती होंगी । उसे बडे़-बडे़ ख्याल सूझते होंगे । लेकिन क्या उसका कोई भी विचार प्रकाश के किन्चित् भी निकट पहुंच सकता है ? अंधे व्यक्ति को तो अंधकार का भी पता नहीं होता है ! अंधकार को जानने के लिए भी तो आंखें जरूरी हैं ! अंधकार का ज्ञान प्रकाश के अभाव का ही तो ज्ञान है । आंखें न होने पर वह भी नहीं हो सकता है । अंधे व्यक्ति को अंधकार का ही ज्ञान नहीं है तो प्रकाश का अनुमान तो असम्भव ही है ।
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लेकिन धर्म बना हुआ है प्रकाश की शिक्षा और उपदेश ! ओह ! क्या इससे बडी़ भी भूल हो सकती है ? विचार की दिशा में सत्य को जानने और पाने का कोई द्वार नहीं है । लेकिन द्वार जरूर है । वह द्वार है आंख की दिशा में, अनुभव की दिशा में, साक्षात्कार की दिशा में ।
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क्या इससे मेरा अर्थ है कि आप विचार न करें और विश्वास करें ? विश्वास तो विचार से भी नीचे गिर जाना है । विचार से नीचे नहीं गिरना है, विचार से ऊपर उठना है । और विचार की सीमाओं तक पहुंचाने में विचार सहयोगी है । उसके आगे विश्वास नहीं करना है, वरन् निर्विचार हो जाना है ।
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विश्वास तो विचार ही नहीं पैदा होने देता है । इसलिए विश्वास के विरोध में मैं कहता हूं विचार करो । लेकिन विचार पर ही रुक मत जाओ । विचार की दिशा में ही भटक मत जाओ । विचार की सीमाओं को देखो और पहचानो । अज्ञात को जानने की उसकी असमर्थता का दर्शन करो । ऐसे निर्विचार के लिए पथ प्रशस्त होता है । विश्वास पर जो ठहर जाता है, वह तो चलता ही नहीं है । विचार में जो चलता ही जाता है, वह अन्तहीन श्रृंखला में पड़ जाता है ।
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निर्विचार को जो उपलब्ध होता है, वह सत्य को उपलब्ध हो जाता है । विश्वास के कांटे को विचार के कांटे से निकालना है । विचार के कांटे को निर्विचार के कांटे से निकालना है । और निर्विचार के कांटे को फेंक देना है, क्योंकि फिर कोई कांटा निकालने को नहीं रह जाता है । फिर जो चेतना शेष रह जाती है, वही आंख है जिससे सत्य का साक्षात्कार होता है ।
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ओशो
सत्य की पहली किरण
प्रवचन ४ से संकलन ॥
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