शनिवार, 28 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये ।*
*पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौं कहिये ॥*
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साभार ~ Raj Gupt

भक्त की आधारभूत आकांक्षा क्या है?

बहुत आकांक्षाएं--तो संसार;
एक आकांक्षा--तो भक्ति।
धन चाहिए, पद भी चाहिए, मान चाहिए, मर्यादा चाहिए, प्रतिष्ठा चाहिए--ऐसी बहुत सी आकांक्षाएं--तो संसार। अनेक आकांक्षाओं में दौड़ता हुआ मनुष्य संसारी है। और जिसने अपनी सारी आकांक्षाओं को एक आकांक्षा में उंडेल दिया--कि मैं उसे जान लूँ, जो सत्य है; उस प्यारे को पहचान लूं, जिससे मैं आया और जिसमें मैं जाऊँगा, जो मेरा शाश्वत स्वरूप है; इस एक आकांक्षा का नाम--भक्ति।
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एक ही आकांक्षा है भक्त की--कि रहस्य का परदा उठे; कि ऐसा अज्ञान में न जीऊं, आंख मेरी खुले और जो छिपा है सबके भीतर, वह मुझे दिखाई पड़ जाए। ऐसे ऊपर-ऊपर से पहचान न हो, अंतर से अंतर मिल जाए, हृदय से हृदय मिल जाए। मैं इस जगत की मूलसत्ता को देख लूं; उस सत्ता को देख कर ही मैं अपने को भी देख पाऊंगा, अपने को भी पहचान पाऊंगा। और उसी पहचान से आनंद की शुरुआत होती है।
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आदमी का एक ही दुख है--कि उसे पता नहीं कि कहां से है, क्यों है और कहां जा रहा है ! आदमी का एक ही दुख है, उसे परमात्मा का कोई अनुभव नहीं। और जब तक यह परदा न उठे ...। वह जो छोटीसी, झीनी सी आड़ है...। झीनीसी ही आड़ है। कोई बहुत बड़ी चीन की दीवाल नहीं है--आदमी और परमात्मा के बीच; बड़ी झीनी सी दीवाल है; बड़ा झीनी सा परदा है। और मजा है कि वह परदा भी परमात्मा ने नहीं डाला हुआ है। वह परदा भी हमने डाला हुआ है।
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अच्छा तो यही होगा कहना कि परदा परमात्मा पर नहीं है; परदा हमारी आंख पर हैं। सूरज तो बाहर खड़ा है, लेकिन तुम दरवाजे बंद किए बैठे हो। दरवाजा खोलो--सूरज भीतर आ जाए। तुम जब तक दरवाजा न खोलोगे, सूरज भीतर आएगा भी नहीं; सूरज दस्तक भी न देगा द्वार पर। सूरज तुम्हारी शांति में बाधा न डालेगा। तुम दरवाजा खोलो--और सूरज भीतर आ जाए।
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बस, ऐसी ही बात है। तुम जरा आंख खोलो और परमात्मा भीतर आ जाए। यह जो परदा है, तुम्हारी ही आंख पर है। और यह जा परदा है, वह तुम्हारी ही अस्मिता और अहंकार का है। यह जो परदा है, वह तुम्हारे ही तथाकथित थोथे ज्ञान का है।
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अब यह बड़े आश्चर्य की बात है कि लोगों को कुछ भी पता नहीं--अपना पता नहीं, परमात्मा का पता नहीं--और प्रत्येक ऐसा मान कर चलता है कि उसको पता है। पूछो किसी से ईश्वर है? वह फौरन जवाब देेने को तैयार है। यह तो कहेगा कि ‘हां है।’ या रहेगा ‘नहीं है।’ मगर जवाब हर हालत में देगा।
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शायद ही तुम्हें ऐसा आदमी मिले, जो कहेः ‘मुझे पता नहीं।’ और अगर ऐसा आदमी मिल जाए, तो समझना कि इसी को किसी दिन पता होगा; यही दिन पता कर पाएगा। क्योंकि कम से कम ईमानदार तो है। ईश्वर का तुम्हें पता नहीं है और कहते हो ‘पता है; मानता हूं कि ईश्वर है।’ पता नहीं है और कहते हो कि ‘मानता हूं ईश्वर नहीं है, इससे और ज्यादा भ्रांति क्या होगी !
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स्पष्ट, इतनी बात तो स्वीकार करो कि मुझे मालूम नहीं है। है या नहीं--कुछ भी मालूम नहीं। तो खोज पैदा होती है। किताबों में पढ़ने से ईश्वर नहीं मिलता। किसी की बात मान लेने से ईश्वर नहीं मिलता। विश्वास से काम नहीं चलता; अनुभव चाहिए। तो भक्त की एक ही आकांक्षा है कि अनुभव हो। ‘उठा दोे...’ यह जो छोटा सा परदा है। यह हटा दोे।
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भक्त की एक ही प्यास है। रोता है; तड़फता है; पुकारता है। मगर सारी पुकार, सारी प्रार्थना का एक ही सार है--कि अब परदा और नहीं सहा जाता ! अब तुम्हें बिना जाने जीया नहीं जाता। अब जीने में--तुम्हारे बिना--कोई अर्थ नहीं मालूम होता; कोई संगति नहीं मालूम होती।
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और कब तक भटकाओगे? और कब तक चलाओगे--कोल्हू के बैल में? और कब तक ऐसे ही चक्कर काटता रहूंगा--लट्टू की तरह--व्यर्थ? बहुत काट लिया चक्कर; अब मुझे एक बार देख लेने दोे कि मैं कहां से हूं, क्यों हूं और कहां जा रहा हूं! और उस घड़ी के उतरते ही जीवन रूपांतरित हो जाता है। फिर आनंद ही आनंद है, उत्सव ही उत्सव है।
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तो भक्त का कहना इतना ही है कि तुम्हें बिना जाने उत्सव नहीं हो सकता। अज्ञान में दुख ही होगा, नर्क ही होना--स्वर्ग नहीं हो सकता। इसलिए सब दांव पर लगा कर मैं तुम्हारी रोशनी चाहता हूं। सब खोने को तैयार हूं; सब अर्पित करने को तैयार हूं; सब समर्पित करने को तैयार हूं; जीवन ले लो, मगर बोध दे दोेे। तुम्हारे चरण मिल जायें, तुम्हारा स्पर्श हो जाए, फिर कोई भी कीमत महंगी नहीं है, फिर सौदा बुरा नहीं है।
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नही सांझ नही भोर # ८
🌹🌹🙏 ओशो

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