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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २७. राग धनाश्री - १०=*
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(संस्कृतमय)
कवि का संस्कृत भाषा में काव्य विनोद
वृक्ष के रूपक से शरीर का वर्णन :
*दृश्यते वृक्षं एक अति चित्रं ।*
*ऊर्ध्दमूलमधोमुख शाखा जंगम द्रुम श्रुणु मित्रं ॥(टेक)*
हे मित्र ! एक जंगम(चलते फिरते) वृक्ष का वर्णन सुनो ! इसकी जड़ ऊपर की ओर हैं तो मुख नीचे की ओर । इस प्रकार, वह जंगम वृक्ष अतिशय आश्चर्योत्पादक है ॥टेक॥
*चतुर्बिश तत्वभिर्निर्मितं वाचः यस्य दलानि ।*
*अन्योऽन्य वासनोद्भव तस्य तरोः कुसुमानि ॥१॥*
वह चौबीस(२४) तत्त्वों से रचित है । इसके पत्र वाणी रूप में है । उस वृक्ष के पुष्प एक दूसरे की वासना(इच्छा) से उद्भुत हैं ॥१॥
*सुख दु:खानि फलानि अनेकं नानास्वादन पूतं ।*
*तत्रात्मा बिहंगम तिष्ठति सुन्दर साक्षीभूतं ॥२॥*
सुख एवं दुःख ही इसके फल हैं । वे विविध स्वाद(रस) से परिपूर्ण हैं । वहाँ आत्मारुपपक्षी बैठा हुआ है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि वह पक्षी साक्षी होकर बैठा है ॥
भगवद्गीता में इस वृक्ष का वर्णन इस प्रकार है –
*ऊर्ध्वमूलमध: शाखम् अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।*
*छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥*
इत्यादि (अ. १५, १-३ श्लो.)
(क्रमशः)

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