शनिवार, 28 सितंबर 2019

= सुन्दर पदावली(२७. राग धनाश्री - १०) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= २७. राग धनाश्री - १०=*
(संस्कृतमय) 
कवि का संस्कृत भाषा में काव्य विनोद 
वृक्ष के रूपक से शरीर का वर्णन : 
*दृश्यते वृक्षं एक अति चित्रं ।* 
*ऊर्ध्दमूलमधोमुख शाखा जंगम द्रुम श्रुणु मित्रं ॥(टेक)* 
हे मित्र ! एक जंगम(चलते फिरते) वृक्ष का वर्णन सुनो ! इसकी जड़ ऊपर की ओर हैं तो मुख नीचे की ओर । इस प्रकार, वह जंगम वृक्ष अतिशय आश्चर्योत्पादक है ॥टेक॥ 
*चतुर्बिश तत्वभिर्निर्मितं वाचः यस्य दलानि ।* 
*अन्योऽन्य वासनोद्भव तस्य तरोः कुसुमानि ॥१॥* 
वह चौबीस(२४) तत्त्वों से रचित है । इसके पत्र वाणी रूप में है । उस वृक्ष के पुष्प एक दूसरे की वासना(इच्छा) से उद्भुत हैं ॥१॥ 
*सुख दु:खानि फलानि अनेकं नानास्वादन पूतं ।* 
*तत्रात्मा बिहंगम तिष्ठति सुन्दर साक्षीभूतं ॥२॥* 
सुख एवं दुःख ही इसके फल हैं । वे विविध स्वाद(रस) से परिपूर्ण हैं । वहाँ आत्मारुपपक्षी बैठा हुआ है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि वह पक्षी साक्षी होकर बैठा है ॥ 
भगवद्गीता में इस वृक्ष का वर्णन इस प्रकार है – 
*ऊर्ध्वमूलमध: शाखम् अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।* 
*छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥* 
इत्यादि (अ. १५, १-३ श्लो.)
(क्रमशः)

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