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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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५७ - प्रश्न । पँजाबी त्रिताल
अलख देव गुरु देहु बताइ,
कहां रहो त्रिभुवनपति राइ ॥टेक॥
धरती गगन बसहु कैलास,
तिहूं लोक में कहां निवास ॥१॥
जल थल पावक पवना पूर,
चँद सूर निकट कै दूर ॥२॥
मंदिर कौण कौण घरबार,
आसन कौण कहो करतार ॥३॥
अलख देव गति लखी न जाइ,
दादू पूछै कह समझाइ ॥४॥
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परमेश्वर से निवास विषयक प्रश्न कर रहे हैं -
तीनों लोकों के स्वामियों के राजा, मन इन्द्रियों के अविषय, परब्रह्म गुरुदेव ! आप कहां रहते हैं, यह बताइये ।
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पृथ्वी पर या आकाश में या कैलाश में बसते हैं ? तीनों लोकों में से आपका निवास स्थान किस स्थान पर है ?
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जल में वो स्थल में वो अग्नि में वो वायु में आप परिपूर्ण रूप से रहते हैं ? चन्द्र सूर्य के निकट वो दूर रहते हैं ?
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आपकी उपासना करने योग्य मन्दिर कौन - सा है ? आपका घर बार कहां है ? हे करतार ! आपके विराजने का आसन कहां है ?
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हे अलख देव ! आपकी माया हमसे नहीं जानी जाती, इसलिये आपसे पूछते हैं, आप समझाकर कहो । इन सब प्रश्नों का उत्तर अगली साखियां दे रही हैं -
उत्तर की साखी -
दादू मुझ ही माँहीं मैं रहूं, मैं मेरा घरबार ।
मुझ ही माँहीं मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥ (४/२०८)
दादू मैं ही मेरा अर्श में, मैं ही मेरा थान ।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ (४/२०९)
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार ।
मेरे तकिये मैं रहूं, कहै सिरजनहार ॥ (४/२१०)
दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अँग ।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै परसँग ॥ (४/२११)
(क्रमशः)

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