बुधवार, 25 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करही ।* 
*दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १९५)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ##भाग १ ##स्वार्थ*
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एक माता के तीन पुत्र थे, उसने तीनों पुत्र -वधुओं को यह कह कर कि मैं मांगू तब दे देना अपने आभूषण दे दिये ।
बड़ी को गले का, बिचली को हाथों के और छोटी को पैर के बांट दिये । माई की सहसा बोली बंद हो गई ।
उसनें संकेत से बड़ी बहू को बुलवाया और कंठों को हाथ लगा दान करने के लिये भूषण माँगा । 
उसके पति ने पुछा - "माँ क्या कहती है ?" 
वह बोली - "ये कहती है कि अब मेरे कंठ रुक गये हैं बोला नही जाता ।"
फिर बिचली को बुलवाया और हाथ के हाथ लगा कर हाथों के आभूषण माँगे । 
उसके पति ने पूछा - "माँ क्या कहती है ?" 
वह बोली - "ये कहती है कि अब हाथों की नाड़ियाँ कम चलने लग गई ।" फिर छोटकी को बुलवा कर पैरों को हाथ लगा भूषण मांगे । 
उसके पति ने पूछा - "माँ क्या कहती है ?" 
"ये कहती है कि पैर अब ठंडे हो गये है ।"
समझ जाने पर भी स्वार्थवश अपने-अपने पतियों को मिथ्या बात सुनाकर अंत समय के लिये सासू को कुछ न दिया ।
जान बूझ भी स्वार्थवश, मिथ्या बात बनात ।
कर पद कंठन की मृषा, पतियों को समझात ॥७६॥
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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