🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*कस कस काया तप व्रत कर कर,*
*भ्रमत भ्रमत हम भूल परे ।*
*कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन,*
*कहुँ हम करवत सीस धरे ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २५४)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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शरीर के वश करे से, मन वश होता नांहि ।
पीपाजी ने यह कहा, नृप को टोडा मांहि ॥९॥
एक बार पीपाजी अपने शिष्य टोडा नरेश के पास गये, द्वारपाल ने कहा - "महाराज तो अभी भजन में बैठे हैं ।"
पीपाजी - "भजन में कहा है वे तो चमार के घर अपने घोड़े की जीन बनवा रहे हैं । इतना कह कर पीपाजी अपने आश्रम पर चले गये ।
राजा भजन से उठे, द्वारपाल ने कहा - "गुरुजी आये थे और कहा कि राजा तो चमार के घर घोड़े की जीन बनवा रहे है ।"
राजा को भजन के समय यही संकल्प हो रहा था । उसने अपने शरीर को तो दृढ कर रखा था किन्तु मन चमार के घर था । इसलिये शरीर वश करने से मन वश नहीं होता है ।
सवैया ~
छाया को छेदे छिदे नहीं पक्षी जु,
बांबी के मारे क्यों व्याल मरेगा ।
काठ के काटे कटे न हुताशन,
पानी के पीटे क्यों मीन डरेगो ॥
खोड़ो हो ऊंट रू डांमिये गावह,
ऐसे अज्ञान क्यों का सरेगो ।
काया की त्रास न त्रासिये सो मन,
रज्जब यों न गुमान गिरेगो ॥
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्य राम सा ###

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