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*सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखै ढाहि ।*
*दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निगुणा का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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एक विरक्त तपस्वी एक भंयकर वन में जहां सिंह, व्याध्र हाथी आदि बहुत थे, एक तालाब पर १२ वर्ष तक फल मूलादि खाकर तप करता रहा । अन्त में उसके मन में ऐसी भावना उठी कि मैं १२ वर्ष से तप में लगा हूँ, यदि ईश्वर होता तो मुझे दर्शन देता इसलिये ईश्वर है ही नहीं । ऐसा निश्चय कर तपस्या छोड़ के पीछे भोगों में फँसने को चला ।
सरोवर से कुछ दूर चला कि उसे सम्मुख आते श्री कृष्ण भगवान दृष्टि पड़े, कृष्ण दर्शन होते ही इसकी स्थिति बदली किन्तु कृष्ण तत्काल अन्तर्धान हो गये । तब पुन: दर्शन के लिये इसने बहुत प्रार्थना की ।
आकाशवाणी ने कहा - "तुझे अब इस जन्म में दर्शन नहीं होंगे कारण तू कृतज्ञ नहीं है । १२ वर्ष तक तेरी इस घोर वन में सिंह आदि से रक्षा की किन्तु तूने फिर भी मेरी सत्ता में संशय किया, यदि ईश्वर नहीं होता तो तू अपना योगक्षेम इस वन में कैसे कर सकता था ।"
कृतज्ञता बिन जीव को, होता पश्चाताप ।
तापस रोया बहुत फिर, हरि समझाय आप ॥८९॥
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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