#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= २७. राग धनाश्री - १२=*
.
(आरती)
*आरती पारब्रह्म की कीजै ।*
*और ठौर मेरौ मन न पतीजै ॥(टेक)*
*गगन मंडल मैं आरती साजी,*
*शब्द अनाहद झालरि बाजी ॥१॥*
*दीपक ज्ञान भया प्रकासा,*
*सेवग ठाडे स्वामी पासा ॥२॥*
*अति उछाह अति मंगल चारा,*
*अति सुष बिलसै बारंबारा।३॥*
*सुंदर आरती सुंदर देवा,*
*सुंदरदास करै तहां सेवा ॥४॥*
परा पूजा : निर्गुण उपासना की परा पूजा विधि में आरती(आरार्ति = पूजा) का भी विधान माना गया है । यह परा पूजा उस निराकार उपास्य देव की मानसिक पूजा होती है । परन्तु लौकिक आरती के समान ही सन्तों ने इस आरती में भी अलौकिक साधनों की कल्पना कर ली है । श्री शंकराचार्य ने भी अपने ग्रन्थों में यह पूजा की है । उसी परम्परा में महात्मा सुन्दरदासजी भी उस निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा की आरती पूजा कर रहे हैं ॥ (इस आरती विधि में भी घण्टा घडियाल आदि की कल्पना की गयी है ।जैसे – दीपक के स्थान पर ज्ञान के रूप में दीपक की कल्पना की गयी । घण्टा के स्थान पर अनाहत नाद की । यहाँ अपरोक्षता सेव्य-सेवक सम्बन्ध प्रदर्शित करती है । तथा ब्रह्मानन्द की प्राप्ति ही अत्युसाह है ।)
मैंने गगनमण्डल(शून्य लोक) में यह आरति पूजा विधान करने का निश्चय किया है । यहाँ ‘झालर’ के स्थान पर ‘अनाहत नाद’ का उपयोग किया है ॥१॥
‘ज्ञान’ के स्थान पर ‘दीपक’ का । ‘सेवक’ में स्वयं हूँ तथा ‘स्वामी’ हैं सम्मुखस्थ आराध्य निर्गुण निराकार ब्रह्म ॥२॥
ऐसी आरति के सम्पादन से भक्त के मन में भगवान् की भक्ति के प्रति अत्यधिक उत्साह एवं मंगलभावना उत्पन्न होती है । साथ ही पुनः पुनः अतिशय सुख की भी अनुभूति होती है ॥३॥
ऐसे सात्त्विक समायोजन में सभी साधन-आरति, आरति करने वाला भक्त तथा आरति किये जाने योग्य देवता – तीनों ही सुखमय प्रतीत होते हैं । अतः महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं – ऐसे समन्वय में निराकार प्रभु की आराधना बहुत सुखकर प्रतीत होती है ॥४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें