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*दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।*
*तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥*
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साभार ~ Atul Verma
यह मैं आपसे कहना चाहूंगा कि पानी, जब भी कोई व्यक्ति, अपवित्र व्यक्ति पानी के पास बैठता है अंदर जाने की तो बात अलग पानी के पास भी बैठता है, तो पानी प्रभावित होता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों से आच्छादित हो जाता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों को अपने में ले लेता है।
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इसलिए दुनिया के बहुत धर्मों ने पानी का उपयोग किया है। ईसाइयत ने बप्तिस्मा, बेप्टिज्म के लिए पानी का उपयोग किया है। पानी बहुत शीघ्रता से चार्ज्ड हो जाता है। पानी बहुत शीघ्रता से व्यक्तित्व से अनुप्राणित हो जाता है। पानी पर छाप बन जाती है।
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लाखों—लाखों वर्ष से भारत के मनीषी गंगा के किनारे बैठकर प्रभु को पाने की चेष्टा करते रहे हैं। और जब भी कोई एक व्यक्ति ने गंगा के किनारे प्रभु को पाया है, तो गंगा उस उपलब्धि से वंचित नहीं रही, गंगा भी आच्छादित हो गई है। गंगा का किनारा, गंगा की रेत के कण—कण, गंगा का पानी, सब, इन लाखों वर्षों में एक विशेष रूप से स्पिरिचुअली चार्जड, आध्यात्मिक रूप से तरंगायित हो गया है।
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इसलिए हमने गंगा के किनारे तीर्थ बनाए। इसलिए लोग गंगा की यात्रा करते रहे। इसलिए लोग सोचते थे कि गंगा में जाकर पाप धुल जाएंगे। वह पाप गंगा की वजह से नहीं धुल सकते, लेकिन गंगा के पास जो मिल्यु है, गंगा के पास जो वातावरण है, वह जो लाखों—लाखों वर्षों की छाया है, उस छाया में जरूर आप अगर अपने हृदय के द्वार खोलें, तो आप दूसरे आदमी होकर वापस लौट सकते हैं। गंगा एक आध्यात्मिक यात्रा भी है, एक नदी ही नहीं। और इस तरह के बहुत—से प्रयोग हुए हैं।
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जैनों के बाईस तीर्थंकर पार्श्वनाथ हिल्स पर निर्वाण को उपलब्ध हुए है। एक ही पर्वत पर बाईस तीर्थंकर निर्वाण को उपलब्ध हुए हैं, चौबीस तीर्थंकर में से। यह आकस्मिक नहीं मालूम होता, क्योंकि बाईस तीर्थंकर चौबीस में! हजारों साल का फासला है। इन हजारों साल में ये बाईस व्यक्ति अपने मरने के क्षण में एक छोटी—सी पहाड़ी पर पहुंच गए !
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एक छोटा—सा अणु जो आंख से दिखाई नहीं पड़ता ! अगर हम अणु को समझना चाहें, तो अगर एक लाख अणुओं को एक के ऊपर एक रखें, तो आपके बाल की मोटाई के बराबर होंगे। एक इतना छोटा—सा अणु एक लाख बीस हजार आदमियों को राख कर देता है विस्फोट से।
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और जब एक तीर्थंकर की आत्मा उसके शरीर से छूटती है, तो जो शक्ति आत्मा को और शरीर को बांधे हुए थी, वह रिलीज होती है, पहली दफा। करोड़ों—करोड़ों वर्षों से यह आदमी शरीर से बंधा रहा है। अब इसकी आत्मा सदा के लिए शरीर को छोड़ रही है। शरीर और इसको बांधने वाली जो शक्ति थी, वह छूटेगी। वही शक्ति इस पहाड़ पर बिखर जाएगी।
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बाईस तीर्थंकर जाकर उस पहाड़ को इलेक्ट्रिफाइड कर दिए, वह पहाड़ मैग्नेटिक हो गया। फिर इसके बाद लाखों वर्षों तक लोग उस पहाड़ की तीर्थयात्रा करते रहे हैं, इस आशा में कि वह मैग्नेटिज्म, वह चुंबक, उनके प्राणों को भी छू ले और स्पर्श कर ले। जैसा जैनों ने प्रयोग किया है पार्श्वनाथ हिल्स पर, ठीक वैसा ही प्रयोग हिंदुओं ने गंगा के किनारे किया है।
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अरब में एक गांव है, कुफा। उस गांव में अब तक मुसलमान के अतिरिक्त कोई भी प्रवेश नहीं पा सका, सिर्फ एक आदमी को छोड्कर, पूरे इतिहास में चौदह सौ साल के। मुसलमान के अतिरिक्त उस गांव में प्रवेश नहीं हो सकता, और साधारण मुसलमान भी प्रवेश नहीं पा सकता है। असाधारण रूप से, वस्तुत: जो मुसलमान हो, सच में जिसका हृदय रूपांतरित हुआ हो और परमात्मा के लिए समर्पित हो गया हो, और जिसने जाना हो कि एक ही अल्लाह है, वही प्रवेश पा सकता है।
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सिर्फ एक आदमी, एक अंग्रेज खोजी बर्टन उसमें प्रवेश पा सका है गैर—मुसलमान। लेकिन उसको भी गैर—मुसलमान कहना ठीक नहीं है। क्योंकि बीस साल उसने मुसलमान साधना की, सिर्फ उस गांव में प्रवेश पाने के लिए। और जब वह बिलकुल मुसलमान हो गया, नाममात्र को ही बर्टन रह गया, चमड़ी भर अंग्रेज की रह गई और सब तरह से वह मुसलमान हो गया, तब उसे प्रवेश मिला।
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मुसलमानों ने इस गांव को प्रयोग किया है चार्ज करने का। इन चौदह सौ वर्षों में उन्होंने एक अनूठी छोटी—सी जगह निर्मित की है। उसमें प्रवेश पाते ही कोई आदमी रूपांतरित हो जाए, ऐसी व्यवस्था की है। उसमें वे ही लोग प्रवेश पा सकते हैं, जो बहुत गहन प्रार्थना में उतर गए हैं। वह सारा वातावरण उससे प्रभावित हो जाता है। कण—कण उनके प्रभाव को पी लेता है, आत्मसात कर लेता है।
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गीता दर्शन भाग–5,
अध्याय—10
OSHO

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