मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग. १/३


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवत: ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥१॥*
महर्षि श्रीदादूदयालुजी महाराज प्रारिप्सित ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिये वेद तथा शिष्टपरम्परा से प्राप्त अपने इष्ट देवता के प्रति नमस्कारात्मक मंगलाचरण कर रहे हैं- *दादू नमो नमो निरन्जनं !* यहाँ निरन्जन निराकार परमात्मा को बारंबार नमस्कार किया गया है ।
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मंगलाचरण के माहात्म्य के विषय में महामुनि पाणिनि के “वृद्धिरादैच्”(पा.सू.१.१.१.) सूत्र के भाष्य में महाभाष्यकार पतंजलि ने लिखा है- “ग्रन्थ के आदि मध्य एवं अन्त में मंगलाचरण अवश्य करना चाहिये; क्योंकि मंगलाचरण करने वाला पुरुष शूरवीर एवं दीर्घायु होता है और मंगलाचरण करके पढ़ने वाले छात्र वृद्धिमान् होते हैं ।”
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मंगलाचरण तीन प्रकार का होता है- १.नमस्कारात्मक, २.वस्तुनिर्देशात्मक एवं ३.आशीर्वादात्मक ।
श्रीदादूजी महाराज ने भी अपने इस अनुभव वाणी ग्रन्थ में उक्त तीनों प्रकार के मंगलाचरण किये हैं, जैसे ग्रन्थ के आदि में “नमो नमो” यह नमस्कारात्मक मंगल है । “जय जय जय जगदीश तूँ” यह ग्रन्थ के मध्य भाग में आशीर्वादात्मक मंगल है और ग्रन्थ के अन्त में “सत्य राम सब माँही रे” इस पद्य से स्वरूप निर्देशात्मक मंगल किया है ।
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यहाँ कोई शंका करता है कि “नमो नमो” यह दो बार पढ़ने से ‘पुनरुक्त’ दोष आता है? परन्तु यह शंका ठीक नहीं है; क्योंकि जहाँ स्तुति या निन्दा वाक्य होता है वहाँ शब्दों का बार बार उच्चारण करना दोष नहीं माना जाता; क्योंकि विद्वानों के ऐसे ही वचन मिलते हैं, जैसा कि काव्यप्रकाश की प्रदीप टीका में लिखा है कि विस्मय विषाद दैन्य कोप अवधारण प्रसाद तथा हर्ष के द्योतक में शब्द का दो बार उच्चारण दोष नहीं होता । प्रत्युत यहाँ पर दो बार “नमो नमो” कहने से हर्षादि की अभिव्यक्ति होने के कारण गुण हो गया ।
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इस प्रकार इष्ट देवता को नमस्कार कर, गुरुदेव तथा सर्वकाल के साधु-महात्माओं को भी नमस्कार किया- *नमस्कार गुरुदेवतः* तथा *वन्दनं सर्वसाधवा । प्रणामं पारंगतः* इस वाक्य से नमस्कार का ‘संसार-सागर’ से पार होना बतलाया है ।
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शास्त्र में लिखा है कि भगवान् कृष्ण को एक बार भी किया गया नमस्कार दश अश्वमेघ यज्ञों के तुल्य फल देने वाला होता है; परन्तु इसमें अन्तर इतना ही है कि उतने अश्वमेघ यज्ञ करने वाले को तो फिर भी संसार में जन्म लेना पड़ता है, किन्तु भगवान् कृष्ण को प्रणाम करने वाला इस भवबन्धन से मुक्त हो जाता है । मनु ने भी कहा है कि अपने से बड़ों के प्रति नित्य अभिवादनशील है, वृद्धजनों की सेवा करता है उसकी आयु, विद्या, बल एवं यश निरन्तर बढ़ते ही रहते हैं ॥१॥
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*परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् ।*
*निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥२॥*
अपने इष्टदेव के स्वरूप को बताते हुए श्रीदादूदेव उन्हें ही पुनः प्रणाम कर रहे हैं- परब्रह्म, निराकार, निर्मल, निरन्जन स्वरूप परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ ।
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उपनिषद् में भी ब्रह्म का स्वरूप बताते हुए कहा गया है कि वह ब्रह्म एक अद्वितीय, शुद्ध स्वयंज्योति: - स्वरूप, निर्गुण तथा सर्वगुणाश्रयभूत, सर्वगत, साक्षी, आवरणरहित, निरात्मा तथा सब आत्माओं से परे हैं ॥२॥
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*गुरु प्राप्ति और फल*
*दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद ।*
*मस्तक मेरे कर धर्या, देख्या अगम अगाध ॥३॥*
बाल्यावस्था में अहमदाबाद नगर के ‘काँकरिया’ तालाब के किनारे बालकों के साथ खेलते हुए श्रीदादूजी को भगवान् ने अकस्मात् वृद्ध रूप धारण कर दर्शन दिया । तथा वे उनके मस्तक पर करकमल रख कर वेद-शास्त्रों से भी अप्राप्य ब्रह्मतत्त्व का उपदेश कर अपने धाम पधार गये ।
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उस समय श्रीदादूजी महाराज के मन में विचार आया कि भगवान् के ऐसे दुर्लभ दर्शन मुझे कैसे प्राप्त हो गये, क्योंकि अभी तो मैं अबोध बालक ही हूँ, अतः भगवद्दर्शन का तो अज्ञ को अधिकार नहीं, अथ च अभी तक ऐसी कोई उपासना भी नहीं की कि जिससे मैं ऐसे दुर्लभ दर्शन का पात्र होऊँ !
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और उन्होंने मेरे शिर पर जो अपना वरदहस्त अर्पण किया, यह तो उन्होंने मुझ पर बहुत ही कृपा की; क्योंकि उनकी ऐसी कृपा तो ब्रह्मा, शंकर तथा लक्ष्मी पर भी नहीं हुई और मेरे मन में ब्रह्मज्ञान की भी कोई जिज्ञासा नहीं थी तथा न ही मैंने उनसे दर्शन देने की प्रार्थना ही की थी ! 
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इतना ही नहीं, शास्त्रों के अनुसार तत्त्वजिज्ञासु शिष्य को श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु के सम्मुख हाथ में समिधा लेकर जाना चाहिये, इस वैदिक मर्यादा को भी त्यागकर उन्होंने स्वयं ही मेरे पास आकर मुझ को ब्रह्म का उपदेश किया ।
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इस तरह विचारमग्न श्रीदादूजी महाराज भगवान् की इस, कृपा का कोई कारण विशेष नहीं जान पाये । अन्त में उन्होंने निश्चय किया कि यह तो उस करुणा-वरुणालय की मुझ पर सर्वथा अहेतुकी कृपा ही हुई है । यह जान कर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनके श्रीमुख से अकस्मात् “गैब माँहि गुरुदेव मिल्या”- यह साखीवचन प्रस्फुटित हुआ ।
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मस्तक पर हाथ रखने का भाव यह है- गुरुजन शिष्य को तीन प्रकार से दीक्षा देते हैं । कुलार्णव तन्त्र में भगवान् शंकर पार्वतीजी को समझाते हुए कहते हैं- “हे पार्वती ! जैसे पक्षी अपने पंखों के स्पर्श से अपने बच्चों का वर्धन करता है वैसे ही गुरुदेव स्वकर-स्पर्श द्वारा शिष्य को दीक्षा देते हैं । यह *‘स्पर्शदीक्षा’* कहलाती है और जैसे कछुआ अपने बच्चों का मन से ध्यान करता हुआ उनका पोषण करता है उसको *‘वैधदीक्षा’* कहते हैं, और जैसे मछली अपने बच्चों को नेत्र द्वारा देखते हुए लालन-पालन करती है उसको *‘दृगदीक्षा’* कहते हैं ।”
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अतः यहाँ श्रीदादूजी महाराज के मस्तक को भगवान् ने हाथ से स्पर्शकर उन्हें *स्पर्शदीक्षा* प्रदान की । दर्शन देकर *दृग्दीक्षा* तथा मन से ध्यान कर *वैधदीक्षा* प्रदान की । यों, मस्तक पर हाथ रखने से श्रीदादूदयालुजी का त्रिविध ताप नष्ट हो गया, दर्शन देने से कर्मक्षय और भगवान् का मन से ध्यान करने से उनके मानसिक विकार नष्ट हो गये इस प्रकार श्रीदादूदयालुजी तत्काल(भवबन्धन से) मुक्त हो गये ।
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मस्तक पर हाथ रखने का यह भी भाव हो सकता है कि भगवान् ने मस्तक का स्पर्श करके अपनी सारी शक्ति शिष्य को प्रदान कर दी । इसको *‘शक्तिपात’* कहते हैं, शिष्य के शरीर में यह शक्तिपात स्पर्श, दर्शन तथा शब्द द्वारा होता है । ऐसे शक्तिपातप्रदाता गुरु को *‘देशिक गुरु’* कहते हैं ।
यह शक्तिपात कर्मसाम्य होने पर ही प्राप्त होता है । सूतसंहिता में लिखा है-
*“हे ब्राह्मणो ! यह शक्तिपात शिष्य के कर्मसाम्य(धर्म-अधर्म बराबर) होने पर ही होता है । इसको ‘शाम्भवी शक्ति’ कहते हैं ।”*
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आगमशास्त्रों में भी इसकी चर्चा है । वहाँ लिखा है- “धर्म-अधर्म की साम्यता होने पर ही इस ज्ञानात्मिका शक्ति का शिष्य के शरीर में प्रवेश होता है”॥३॥
(क्रमशः)

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