🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*हम कसिये क्या होइगा, बिड़द तुम्हारा जाइ ।*
*पीछै ही पछिताहुगे, ताथैं प्रकटहु आइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)*
====================
साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
.
#############################
समालोचन प्रेमी की, होती परम विचित्र ।
गोपीगण ने कृष्ण की, करी सुने सो अत्र ॥२९०॥
उद्धवजी श्री कृष्ण का संदेश लेकर गोपियों के पास आये और ज्ञान-वैराग्य की शिक्षाऐं देने लगे ।
उसी समय एक भ्रमर वहां आकर गुंजार करने लगा । उसके मिस से गोपियें उद्धव से कहने लगी - 'भ्रमर ! तू उस निर्दयी तथा कपटी की स्तुति करता है, जिसने छल करके बेचारे राजा बलि का सब कुछ हर लिया था और शूर्पणखा को प्रथम तो अपनी सुन्दरता से मोहित किया । फिर उसका नाक काट कर उसके रूप का नाश किया था । न जाने ऐसे को लोगों ने क्यों अंतर्यामी कहा है यदि वह अंतर्यामी है तो हमारी अंतर्दशा देखकर के हमारा दु:ख क्यो नहीं हरता । इससे ज्ञात होता है कि वह अंतर्यामी नहीं निर्दयी है ।"
इससे सूचित होता है कि प्रेमीगण अपने प्रेम पात्र की समालोचना विचित्र ढंग से करते है ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्य राम सा ###

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें