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*ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास ।*
*ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥*
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साभार ~ Atul Verma
ताओ उपनिषाद-अध्याय 12
OSHO
*"लेकिन संत उस भूख की चिंता करते हैं, जो कि नाभि के अंतरस्थ केंद्र में निहित है।"*
सन्त उस भूख की चिंता करते हैं, जो नाभि के अंतरस्थ केंद्र में निहित है ! मैंने पीछे आपको कहा कि लाओत्से, अस्तित्व का मूल केंद्र नाभि के निकट मानता है और ठीक मानता है। तो एक, हमारे बाहर इंद्रियों का फैलाव है और इन इंद्रियों का सारा संबंध मस्तिष्क से है।
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ध्यान रहे, आंख तो मस्तिष्क में है ही, तो उसका संबंध है; कान भी मस्तिष्क में है, उसका भी संबंध है; लेकिन आप जान कर हैरान होंगे कि जननेंद्रिय, सेक्स की वासना सिर में नहीं जुड़ी है, वह मन से ही संबंधित है। इसलिए मन में जरा सी कामवासना भी उठे, तो कामवासना का केंद्र सक्रिय हो जाता है। तो समस्त इंद्रिय और वासनाएं मस्तिष्क में ही संयुक्त हैं और हमारी चेतना को भी हम मस्तिष्क में ही बिठाए हुए हैं।
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लाओत्से कहता है, इसे नीचे उतारो और इसे हृदय के पास लाओ। हृदय के पास आकर भी वासनाओं में रूपांतरण हो जाता है। इसे और नीचे नाभि के पास लाओ, तो वासनाएं शून्य हो जाती हैं और एक नई भूख का अनुभव होता है। उस भूख का नाम ही अध्यात्म है। नाभि के पास जैसे ही चेतना आती है, एक नई भूख का अनुभव होता है। तब यह सवाल नहीं होता कि मैं क्या पा लूं, क्या हो जाऊं। तब यही सवाल होता है कि जो मैं हूं, उसे जान लूं। हो जाऊं नहीं; जो मैं हूं, उसे जान लूं। यह है एक नई भूख। वस्तुतः जो मेरा सत्य है, वही मेरे सामने प्रकट हो जाए। मुझे कुछ पाना नहीं, मुझे कुछ होना नहीं। मैं जो सदा से हूँ, उसे ही जान लूं, उसका ही उदघाटन हो जाए। पर्दा उठ जाए और मैं पहचान लूं कि मैं कौन हूं। यह भूख नाभि की है। जैसे ही चेतना को कोई नाभि के पास लाता है, वैसे ही उसके जीवन में एक नया प्रश्न खड़ा होता है कि मैं कौन हूं?
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समस्त अध्यात्म, समस्त योग, समस्त साधनाएं, इस भूख का उत्तर हैं। इस प्रश्न को खोज लेने और इसके उत्तर को पा लेने की विधियां हैं। यह अंतरस्थ नाभि की भूख है। और जिस व्यक्ति में यह भूख पैदा हो जाती है, उसका जीवन एक नई खोज पर निकल जाता है। क्योंकि भूख के बिना खोज नहीं होती। भूख न हो, तो खोज कोई क्यों करे? जिसकी भूख होती है, उसकी हम खोज करते हैं।
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लाओत्से कहता है कि संत इस कारण न तो रंग की भूख से भरते, न स्वाद की, न ध्वनि की, न स्पर्श की। वे इंद्रियों की भूख से अपने को आपूरित नहीं करते। वे अपनी चेतना को हटाते हैं उस भूख की तरफ, जो नाभि के अंतरस्थ केंद्र पर छिपी है--स्वयं को जानने की भूख, स्वयं होने की भूख, स्वयं को पाने की भूख।
*"संत पहली का निषेध और दूसरी का समर्थन करते हैं।"*
संत नहीं कहते कि तुम समस्त भूख छोड़ दो। वे कहते हैं, कुछ भूखें हैं, जिनको तुम कितना ही भरो, वे कभी पूरी न होंगी। वे तात्कालिक हैं।
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हमारी समस्त इंद्रियों की भूखें तात्कालिक हैं। आज आप ने भोजन दिया है पेट को, चौबीस घंटे भर बाद भोजन फिर देना पड़ेगा। क्योंकि वो भोजन चौबीस घंटे में चुक जाएगा। वह ठीक वैसा ही है जैसे आपने अपनी कार में पेट्रोल डाला है, आप कार चलाएंगे, वह चुक जाएगा; फिर पेट्रोल डालना पड़ेगा। लेकिन तब आप कार से कोई जद्दोजहद नहीं करते कि तू कैसी कार है, अभी आठ घंटे पहले पेट्रोल दिया था, अब फिर वही बात! तब आप संयम भी नहीं करते कि अब हम बिना पेट्रोल डाले कार चलाएंगे, उपवास पर रखेंगे। आप जानते हैं कि कार की जरूरत है। अगर कार में पेट्रोल नहीं डालना, तो कृपा कर कार से नीचे उतर जाइए। अगर शरीर को भोजन नहीं देना, तो कृपा शरीर से बाहर हो जाइए, छोड़िए। शरीर की चौबीस घंटे जरूरतें हैं, वह चौबीस घंटे पुनरुक्त मांग करेगा।
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शरीर की जरूरतें मांग पैदा करती चली जाएंगी, क्योंकि शरीर एक यंत्र है। इसलिए रोज उसको भर दें, वह रोज खाली हो जाएगा। कभी आप शरीर के भरेपन से उस भरेपन को नहीं पा सकेंगे, जो फिर खाली न हो।
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लेकिन इसमें कुछ चिंतित होने की बात नहीं है। यह ठीक ही है। इसलिए कुछ नासमझ शरीर के दुश्मन हो जाते हैं। वे कहते हैं, शरीर को देने से क्या फायदा, क्योंकि यह तो फिर मांगने लगता है। शरीर को वे रखे चले जाते हैं। खाना, पानी और विश्राम कम देने लगते हैं। सोचते हैं कि वे शरीर के साथ कोई बड़ी भारी विजय-यात्रा पर लगे हैं।
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वे सिर्फ नासमझी में लगे हैं। असल में, उनकी भी आकांक्षा यही थी कि शरीर को एक दफे तृप्त कर दें और वह सदा के लिए तृप्त हो जाए। वह नहीं हुआ, इसलिए वे परेशान हैं। आपकी नासमझी यह है कि आप सोचते हैं, रोज-रोज तृप्त करके एक दिन ऐसी जगह पहुंच जाएंगे कि फिर तृप्त करने की जरूरत न रहेगी। उनकी भी नासमझी यही थी। लेकिन वे आपसे विपरीत हो गए। वे कहते हैं, अब हम तृप्त ही न करेंगे, क्योंकि तृप्ति पूरी नही होती। लेकिन दोनों की उलझन एक है। एक शरीर को तृप्त करके सोच रहा है कि परम तृप्ति पा लूंगा। एक शरीर की तृप्ति रोक कर सोच रहा है कि परम तृप्ति पा लूंगा। लेकिन दोनों को उस परम भूख का पता नहीं है, जो परम रूप से तृप्त हो सकती है।
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ध्यान रखें, क्षुद्र भूख क्षुद्र समय के लिए ही तृप्त होगी। जब पेट में भूख लगती है, तो यह कोई अल्टीमेट, कोई परम भूख नहीं है। जब प्यास लगती है, तो यह प्यास कोई चरम प्यास नहीं है। प्यास की हैसियत है, दो बूंद पानी डाल देते हैं, वह तृप्त हो जाती है। लेकिन दो बूंद की जितनी हैसियत है, उतनी देर में वह वाष्पीभूत होकर उड़ जाता है, प्यास फिर लग आती है। क्षुद्र भूख, प्यास हो, तो क्षुद्र परिणाम ही होगा।
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परम भूख का हमें पता नहीं है। परम भूख एक ही है--अस्तित्व को जानने की, अस्तित्व के साथ एक होने की, अस्तित्व के उदघाटन की। उसे सत्य कहें, परमात्मा कहें या उसे जो नाम देना चाहें दें। लेकिन लाओत्से कहता है कि वह परम भूख इंद्रियों से अपनी चेतना को हटाएं और अपनी चेतना को नाभि के निकट मस्तिष्क से नीचे उतारें। जिस दिन आप नाभि के पास पहुंच जाएंगे, उसी दिन एक नई प्यास का उदघाटन होगा।
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उसी प्यास का नाम प्रार्थना है, उसी प्यास का नाम ध्यान है। और उसी प्यास से हुई खोज का नाम धर्म है। उस प्यास से चल कर आदमी जब उस सरोवर पर पहुंचता है, जहां वह प्यास तृप्त होती है, तो उस सरोवर का नाम परमात्मा है।
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आज इतना ही।

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