शनिवार, 28 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन ।* 
*पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ##भाग २ ##क्षमा*
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एक ब्राह्मण का कोई सम्बन्धी भगवान बुद्ध का शिष्य बन गया था । इससे ब्राह्मण को बड़ा दु:ख हुआ । एक दिन वह बुद्ध के पास जाकर उन्हें गालियां देने लगा ।
बुद्ध शांत भाव से सुनते रहे । जब ब्राह्मण थक कर चुप हो गया तब बुद्ध ने उससे पूछा - 'भाई ! तुम्हारे घर जब कोई मेहमान आवे और तुम उनकी खाने-पीने की वस्तुऐं दो और वे नहीं लें तब उनका क्या करोगे ?" 
ब्राह्मण- "हमारी वस्तुऐं हमारी रह जाती है ।"
बुद्ध - "भाई ! बस, इसी प्रकार तुम्हारी गालियें मैने तो ली नहीं । यदि लेता तो मुझे भी क्रोध आता किन्तु मैं तो चुपचाप बैठा रहा । इसलिये तुम्हारी गालियें तुम्हारे ही पास रही ।"
यह सुनकर के ब्राम्हण लज्जित होकर भगवान बुद्ध का ही शिष्य बन गया ।
क्षमाशील समझाय कर, शांत करत हैं क्रोध ।
शांत किया था बुद्ध ने, विप्र क्रोध दे बोध ॥२२७॥
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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