🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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५९ - त्रिताल
मन मतवाला मधु पीवै,
पीवे बारँबारो रे ।
हरि रस रातो राम के,
सदा रहे इकतारो रे ॥टेक॥
भाव भक्ति भाठी भई,
काया कसणी१ सारो२ रे ।
पोता३ मेरे प्रेम का,
सदा अखँडित धारो रे ॥१॥
ब्रह्म अग्नि जौबन जरै,
चेतन चितहि उजासो रे ।
सुमति कलाली सार वे,
कोइ पीवै विरला दासो रे ॥२॥
प्रीति पियाले पीवही,
छिन - छिन बारँबारो रे ।
आपा धन सब सौंपिया,
तब रस पाया सारो रे ॥३॥
आपा पर नहिं जाणिया,
भूलो माया जालो रे ।
दादू हरि रस जे पिवै,
ताको कदे ना लागे कालो रे ॥४॥
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मद्य के रूपक से राम - भक्ति - रस का परिचय दे रहे हैं - हमारा मन परब्रह्म का साक्षात्कार रूप मद्य - रस का पान करता है और मतवाला रहता है, फिर भी बारँबार पान करता हुआ पाप - ताप हरने वाले राम - रस में सदा एकरस अनुरक्त रहता है ।
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अब राम - रस के बनाने की पद्धति बता रहे हैं - श्रद्धा - भूमि पर भक्ति - भट्टी बनाई गई है । निर्दोष रखने हेतु शरीर को साधन कसौटी१ द्वारा सँयम में रखना, यही उस भट्टी पर रस निकालने२ के लिए पात्र रक्खा गया है । आत्म - प्रेम गीला - कपड़ा३ है, उसे पात्र पर फेरते हुये यह राम - रस रूप मद्य निकालती है ।
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ब्रह्म - ज्ञान अग्नि है, युवावस्था के विकार रूप काष्ठ जलाया जाता है । चित्त में निरँतर चेतनात्मा का चिन्तन रहना ही उक्त अग्नि का प्रकाश है । सुबुद्धि कलाली है ।
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इस पद्धति से यह रस सदा एकरस अखँड धार से निकलता रहता है । अब रस के अधिकारियों का परिचय दे रहे हैं - इस प्रकार निकाले हुये राम - रस का कोई विरले भक्त - जन ही अनन्य प्रेम - प्याले द्वारा क्षण - क्षण में बारँबार पान करते हैं ।
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जब अपने पराये के भेद को कुछ न समझ के, सम्पूर्ण मायिक सँसार - जाल को हृदय से भूलकर, अपना सब प्रकार का अहँकार रूप धन प्रभु को समर्पण किया है; तब सँतों को यह पूर्ण सार रूप रस प्राप्त हुआ है । उक्त प्रकार निकाले हुए हरि - रस का जो पान करते हैं, वे परब्रह्म में ही समा कर रहते हैं । अत: उन पर कभी भी काल का बल नहीं चलता ।
(क्रमशः)

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