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*यहु वन हरिया देखकर, फूल्यो फिरै गँवार ।*
*दादू यहु मन मृगला, काल अहेड़ी लार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*काल का अंग ८४*
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काम कल्पना कोटि विधि, मींच मारि१ मन मौज२ ।
जन रज्जब जीव क्यों रहै, देखि दहों३ दिशि फौज ॥४३॥
कामना से होने वाली कोटि प्रकार की कल्पना ही मृत्यु है, अत: हे साधक ! मन की तरंगों१ को नष्ट२ कर, कारण दशों३ दिशाओं में मन की तरंग रूप सेना देखकर जीव शांति से कैसे रह सकेगा ?
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मन कुरंग१ कित२ जाय चलि, चेतन३ चीता काल ।
रज्जब पटकै पलक में, काटै करि करछाल४ ॥४४॥
चीता सावधान हो तो मृग१ कहाँ२ जा सकता है ? मृग को चीता उछाल४ मार कर काटता है और क्षण भर में पटक लेता है, वैसे ही सावधान३ काल के आगे से मन कहाँ जा सकता है ?
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जैसे शशा१ शिकार में, बचै न काल हुं ओट ।
त्यों रज्जब हम होय कर, क्यों टालै जम चोट ॥४५॥
जैसे शिकार के समय में खरगोश१ अपने कानों की आड़ से बच सकता, हम भी खरगोश के समान होकर काल की चोट कैसे बचा सकेंगे ?
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अंतक१ आतमा राम बिच, अंतर२ नाँहीं कोय ।
जोख्यों३ की जायगह४ वही, जतन५ वहीं तैं होय ॥४६॥
काल१ और आत्मा स्वरूप राम के बीच में कोई भेद२ नहीं है, काल राम से अलग नहीं है, राम का भजन न करने से तो वही स्थान४ दु:ख३ का है और भजन करने से वहाँ से ही काल के बचाव का उपाय५ होता है । अत: राम का भजन करना चाहिये ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित काल का अंग ८४ समाप्तः ॥सा. २७१३॥
(क्रमशः)

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