रविवार, 22 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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५४ - स्वरूप गति हैरान । वर्ण भिन्न ताल
ऐसा राम हमारे आवै, 
वार पार कोइ अंत न पावै ॥टेक॥
हलका भारी कह्या न जाइ, 
मोलमाप नहिं रह्या समाइ ॥१॥
कीमत लेखा नहिं परिमाण, 
सब पचहारे साधु सुजाण ॥२॥
आगो पीछो परिमित नाँहीं, 
केते पारिख आवहिं जाँहीं ॥३॥
आदि अन्त मधि कहै न कोइ, 
दादू देखै अचरज होइ ॥४॥
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राम - स्वरूप साक्षात्कार अवस्था का आश्चर्य दिखा रहे हैं - 
हमारे अनुभव में ऐसा राम आता है जिसका वार - पार जानकर कोई भी अन्त नहीं पाता । 
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वह हलका वो भारी नहीं कहा जाता । वह अमूल्य है तथा माप रहित है । सब विश्व में समा रहा है । 
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उसकी कीमत नहीं हो सकती, तो का हिसाब नहीं हो सकता । सब बुद्धिमान् सँत परिश्रम करके हार गये हैं किन्तु उसके आगे पीछे का माप नहीं कर सके । 
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कितने ही लक्षणों द्वारा परीक्षा करने वाले विद्वान् सँसार में आते हैं और उसके स्वरूप परीक्षण के लिए पूर्ण प्रयत्न करते हैं ...
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किन्तु उसका आदि, मध्य, अन्त कहे बिना ही चले जाते हैं । अत: हमें उसके स्वरूप को देखकर अति आश्चर्य होता है ।
(क्रमशः)

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