सोमवार, 9 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कुछ नाहीं का नाम क्या, जे धरिये सो झूठ ।*
*सुर नर मुनिजन बंधिया, लोका आवट कूट ॥*
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साभार ~ Atul Tock

एक मित्र ने पूछा है कि चंद्रमा पर आदमी पहुंच गया, लेकिन हिंदू शास्त्रों में लिखा है कि वहां देवताओं का वास है ! इसका उत्तर दीजिए।
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इधर गीता चल रही है, उससे इसका कोई प्रयोजन नहीं है। इस पर अगर मैं चर्चा करने बैठ जाऊं, तो गीता बंद कर देनी पड़े। फिर चर्चा का दूसरा रुख, वह मेरी आदत नहीं है। जो मैं बात कर रहा हूं उससे इतर बात करना मुझे पसंद नहीं है। इस तरह के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जाता है, तो उनको लगता है कि भारी नुकसान हो गया।
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फिर मुझे यह भी समझ में नहीं पड़ता कि साधक को क्या प्रयोजन कि चांद पर देवता रहते हैं कि नहीं रहते। आपके भीतर कौन रहता है, इसकी फिक्र करनी उचित है। चांद पर न भी रहते हों, तो कुछ हर्जा नहीं है। और रहते भी हों, तो मजे से रहें ! आपको कुछ लेना—देना नहीं है। इन सब बातों का साधक के लिए कोई अर्थ नहीं होता।
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मैं उतनी ही बातें आपसे कहना पसंद करता हूं जो किसी तरह आपकी साधना के लिए उपयोगी हों। व्यर्थ की बातों में प्रयोजन मुझे नहीं है। आपका प्रश्न गलत है, यह नहीं कहता। किसी के लिए सार्थक हो सकता है, वह खोज में लगे।
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एक मित्र छपा हुआ पर्चा रोज यहां बांटकर मुझे दे जाते हैं। पोस्ट से भी मुझे घर भेजा है। भारी नाराज हैं। वे जो मित्र रोज शोरगुल करके खड़े हो जाते हैं, उनका पर्चा है। उस पर्चे में है कि राजस्थान में किसी आदमी ने कोई किताब लिखी है, कि दशरथ नपुंसक थे, या लक्ष्मण व्यभिचारी थे।
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मुझे पता नहीं है ! मैंने वह किताब पढ़ी नहीं। जिन्होंने पर्चा छापा है, उन्होंने भी नहीं पढ़ी है। किसी अखबार में उन्होंने यह पढ़ा है कि ऐसा किसी आदमी ने लिखा है। वे बार—बार मुझे यहां चिट्ठी लिखकर भेजते हैं कि मैं जवाब दूं। मेरी समझ में नहीं आता ! मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। जिसको प्रयोजन हो, वह खोजबीन में लगे। लेकिन इधर उस सवाल को उठाने का कोई कारण नहीं है।
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लेकिन हमारे मन न मालूम कहा—कहा के सवाल उठाते हैं ! हम सोचते हैं, भारी काम हो रहा है। वह मित्र कल मुझे चिट्ठी लिखकर दे गए हैं, दो दिन से रोज चिट्ठी लिखकर देते हैं, कि वे यहां आधा घंटा मंच पर आकर एक बात सिद्ध करना चाहते हैं। वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि मैं मूर्ख हूं।
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इसे सिद्ध करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं बिना सिद्ध किए इसे मान लेता हूं। इसे सिद्ध तो तब करना पड़े, जब मैं कहूं कि मैं नहीं हूं या उनकी बात को गलत कहूं। मैं मूर्ख हूं। क्योंकि अगर मैं मूर्ख न होऊं, तो उन जैसे बुद्धिमान जनों को समझाने की कोशिश ही क्यों करूं। सहज—साफ ही है। इसको सिद्ध करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि सिद्ध करने में समय व्यय करना है। मैं मान ही लेता हूं।
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कृष्ण के वक्त में अगर वे होते, तो कृष्ण ने एक सूत्र अर्जुन से और कहा होता। उन्होंने कहा होता, हे कौन्तेय, जिनके दिमाग के स्क्रू थोड़े ढीले हैं, उनमें भी मैं हूं। वह कृष्ण नहीं कह पाए, यह एक नुकसान हुआ। उनकी मौजूदगी जरूरी थी। गीता ज्यादा समृद्ध हुई होती। उसमें एक सूत्र और उपलब्ध हो जाता। लेकिन यह बात पक्की है, स्क्रू ढीले हों कि ज्यादा कसे हों, मैं उनके भीतर हूं। इसमें कोई शक—शुबहा नहीं है।
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इस तरह की बातें हमारे मुल्क के मन में न मालूम कैसे—कैसे घूमती रहती हैं ! इन सारी बातों ने हमारे मुल्क को एकदम क्षुद्रतम हालत में खड़ा कर दिया है। सोचें विराट को, खोजें विराट को; व्यर्थ की बातों में समय जाया न करें। लेकिन हम समझते हैं कि भारी संकट आ गया। किसी ने लिख दिया । अब वह बेचारा कुछ खोज—बीन कर रहा होगा। गलत होगा, सही होगा। किन्हीं को उत्सुकता हो, वे सिद्ध करने में लगें।
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पर बड़ा मुश्किल मामला है सिद्ध करना कि थे कि नहीं थे। बहुत कठिन है। पर मुझे तो प्रयोजन भी नहीं है। जिनको प्रयोजन है, वे भी क्यों इतने आतुर हैं, कुछ समझ में नहीं आता ! इस तरह की बातों को जरा भी मूल्य देने की जरूरत नहीं है। कोई लिखे, तो भी देने की जरूरत नहीं है। उसको तूल देने की भी जरूरत नहीं है कि शोरगुल मचाओं। उस शोरगुल से और प्रचार होता है कि यह क्या मामला है! इन सबमें पड़ने की जरा भी जरूरत नहीं है।
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धार्मिक आदमी का यह लक्षण नहीं है। धार्मिक आदमी को एक। ही चिंता है कि किसी भांति उसके जीवन का एक—एक पल रीता जा रहा है, उस रीतते हुए जीवन में वह खाली हाथ ही लौट जाएगा? या कि उस रीतते हुए जीवन में प्रभु की कोई झलक मिलनी संभव है? मैं उसी दृष्टि से सब बोल रहा हूं। आप पूछ लेते हैं, आवश्यक नहीं है कि मैं जवाब दूं। आप पूछ लेते हैं, आपका काम पूरा हो गया। मुझे लगेगा कि इससे आपकी साधना में कोई सहायता मिलेगी, तो ही जवाब दूंगा।
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कुछ ऐसे सवाल लोग पूछते हैं, जो उनके निजी, वैयक्तिक हैं। अब एक व्यक्ति पूछ लेता है। यहां तीस—चालीस हजार आदमी बैठे हों, इनके तीस हजार घंटे खराब करना एक व्यक्ति के निजी प्रश्न के लिए बेमानी है। तीस हजार घंटे बहुत बड़ा वक्त है। अगर एक आदमी की जिंदगी, तो दस साल की जिंदगी एक आदम। की खतम होती है, चालीस हजार घंटे अगर हम खराब करें तो।
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तो एक आदमी कुछ पूछ लेता है, उसकी व्यक्तिगत रुचि है, उसे मेरे पास आ जाना चाहिए। यहां जोर देने की जरूरत नहीं है। और एक बात पक्की समझ लें कि आपने पूछा, मैंने जवाब नहीं दिया, उसका कुल कारण इतना है कि मैं नहीं समझता कि इतने लोग जो यहां इकट्ठे हैं, इनके लिए उस जवाब की कोई भी जरूरत है।

आज इतना ही। लेकिन पांच मिनट बैठेंगे। कीर्तन में सम्मिलित हों और फिर जाएं।

गीता-दर्शन भाग ४,
अध्याय - ९
OSHO

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