रविवार, 29 सितंबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं, बालक ज्यूं पय पीवे ।* 
*ऐसे अन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग-जुग जीवे ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ##भाग ३ ##स्मरण भक्ति*
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एक साधक ने संतवर दादूजी के सुयोग्य शिष्य रज्जबजी से प्रश्न किया - 'माला कौन सी फेरनी चाहिये' 
रज्जबजी बोले-
"मणिये मोहन नाम सब, सृत समीर न मेर ।
जन रज्जब हित हाथ से, आठों पहरे फेर ।"
अर्थात भगवान के नाम ही मणियें हो और श्वास रूपी धागे मे पिरोये जाँय और जिसमें मेर(सुमेरू=हद्द) नहीं हो और जो हित(प्रेम) के हाथ से अष्ट पहर फिराई जाय, ऐसी ही माला फेरनी चाहिये ।
इससे सूचित होता है कि सन्तों की सुमिरणी(माला) परम विलक्षण होती है ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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