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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*भाई रे यूं विनशै संसारा, काम क्रोध अहंकारा ॥टेक॥*
*लोभ मोह मैं मेरा, मद मत्सर बहुतेरा ॥१॥*
*आपा पर अभिमाना, केता गर्व गुमाना ॥२॥*
*तीन तिमिर नहिं जाहीं, पंचों के गुण माहीं ॥३॥*
*आतमराम न जाना, दादू जगत दीवाना ॥४॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद. ११५)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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एक पंडित १२ वर्ष काशी में पढकर आया ।
उसकी स्त्री ने पूछा - "क्या आपने सब विद्या पढ ली ?
पंडित - "हां"
स्त्री - "तो कृपा करके बतावें, पाप का बाप कौन है ?" पंडित उत्तर न दे सका ।
स्त्री ने कहा - "तब तो आपने कुछ भी नहीं पढा, इसलिये फिर पढने पधारें ।"
पंडित ने पुन: काशी का मार्ग लिया, मार्ग में वे सबसे यही पश्न करते कि "पाप का बाप कौन है ?" एक वेश्या ने पंडित की यह दशा देखकर उससे कहा - "आप मेरे यहां भोजन बनाकर खा लिया करें तो प्रतिदिन एक अशर्फी दूंगी ।"
पंडित अपना प्रश्न तो भूल गये और वेश्या की बात मान ली । बहुत अशर्फी जमा हो गई ।
एक दिन वेश्या ने कहा- "आपको बनाने मे कष्ट होता है, स्नान करके शुद्धता से मैं बना दूंगी आप जीम लिया करें । यदि ऐसा करेंगे तो दक्षिणा मे दो अशर्फी दूंगी ।"
लोभवश पंडित ने मान लिया ।
वेश्या ने भोजन बनाकर तैयार किया, पंडित जीमने लगा तब वेश्या ने एक थप्पड़ मारकर के कहा - "अरे मूर्ख ! "पाप का बाप" यह लोभ ही है, जिसके वश हो तूने मेरे हाथ का भोजन भी स्वीकार किया ।"
लोभ पाप का बाप है, इससे संशय नांहि ।
वेश्या भोजन विप्र ने, मान लिया क्षण मांहि ॥४६॥
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्य राम सा ###

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