शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

= सुन्दर पदावली(२७. राग धनाश्री - ९/२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= २७. राग धनाश्री - ९/२=*
*ज्यौं सुपनै नृप रंक ह्वै भूलि गयौ निज रूप ।* 
*जागि पर्यौ जब स्वप्न तैं भयौ भूप कौ भूप ॥२॥* 
*ज्यौं फिरतैं फिरतौ दृसै जगत सकल ही ताहि ।* 
*फिरत रह्यौ जब बैठिकैं तब कछु फिरत न आहि ॥३॥* 
*सुन्दर और न ह्वै गयौ भ्रम तैं जान्यौं आंन ।* 
*अब सुन्दर सुन्दर भयौ सुन्दर उपज्यौ ग्यांन ॥४॥* 
जैसे कोई राजा स्वप्न में अपने को दरिद्र मानकर अपना वास्तविक रूप भूल जाता है ; तथा स्वप्न से जगने पर पुनः स्वयं को राजा समझने लगता है ॥२॥
वैसे ही चलते फिरते पुरुष को यह समस्त जगत् चलता फिरता दिखायी देता है, परन्तु वही पुरुष जब बैठ जाता है तब उसे संसार भी स्थिर ही दिखायी देता है ॥३॥ 
महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं – वस्तुतः न पहले कुछ और था, न अब कुछ और है । यह तो हमको भ्रम के कारण अन्य प्रतीत हो रहा है । जब साधक को यथार्थ का ज्ञान हो जाता है तब यह यथार्थ उसके समझ(निर्मल बुद्धि) में आता है ॥४॥
(क्रमशः)

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