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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*भाई रे यूं विनशै संसारा,*
*काम क्रोध अहंकारा ॥टेक॥*
*लोभ मोह मैं मेरा,*
*मद मत्सर बहुतेरा ॥१॥*
*आपा पर अभिमाना,*
*केता गर्व गुमाना ॥२॥*
*तीन तिमिर नहिं जाहीं,*
*पंचों के गुण माहीं ॥३॥*
*आतमराम न जाना,*
*दादू जगत दीवाना ॥४॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद. ११५)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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लोभी को रहता नहीं, पूर्वापूर्व विचार ।
मुंज लोभ वश भोज को, मारन दिया निकाल ॥४४॥
भोज के पिता ने मृत्यु के समय अपने छोटे भाई मुंज से कहा - "भाई ! भोज अबोध है तब तक राज्य शासन तुम करना, फिर भोज को सौंप देना ।" मुंज ने स्वीकार कर लिया ।
अन्त में भोज की बुद्धि देखकर लोभवश भोज को मरवाने के लिये व्याधों से कहा - "भोज को वन मे ले जाकर मार आओ ।"
मंत्री व्याधों के साथ भोज के पास गये और मुंज की आज्ञा सुनकर बोले - "अब मुझे क्या करना चाहिये ?
भोज - "मुझे मरने का भय नहीं है, किन्तु एक पत्र पहले मुंज को सुना दो फिर कहै वैसा ही करना ।"
भोज ने लिखा - "मान्धाता, राम चन्दर, युधिष्ठिर आदि अनेक राजा हुए किन्तु पृथ्वी किसी के साथ न गई। परन्तु चाचाजी ! ज्ञात होता है कि आप इसे छाती पर लादकर ले जायेगें ।"
इसे पढते ही मुंज की दशा अवर्णनीय हो गयी । मन बदल गया और भोज से क्षमा मांग कर भोज को राज्य सौंप दिया ।
कंस ने लोभवश पिता को गद्दी से उतारा, औरंगजेब ने पिता को कैद किया; अलाउदीन ने चाचा का पेट चीरा इत्यादि अनर्थों का कारण लोभ ही था ।
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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