🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ ।*
*दादू निरपख ह्वै रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥*
==================
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
.
*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
.
ओंकार सांटी१ शकति२, कलम अंट कुल दोय ।
रज्जब अलिफ३ अतीत४ यूँ, सो बंदै सब कोय ॥५॥
माया२ रूप कलम है, ओंकार कलम के पीछे के भग की लकड़ी१ है, उसके पक्ष - विपक्ष रूप दो अंट ही दो कुल हैं, जैसे उन दोनों अंटों से अलग होते ही स्याही का अक्षर३ बन जाता है, वैसे ही जो जाति और भेष रूप दोनों कुलों के पक्ष को छोड़ता है, वही संत४ होता है, उसको सभी वन्दना करते हैं ।
.
द्वै पंख बीरज१ दाल है, बिच अंकुर अतीत२ ।
सो रज्जब ऊँचा चल्या, यहु तीजी रस रीत ॥६॥
बीज१ की दो दाल के समान जाति और भेष रूप दो पक्ष हैं, उन दोनों के बीच से निकलने वाले अंकुर के समान संत२ हैं, जैसे अंकुर दोनों दालों वालों को छोड़ कर ऊंचा जाता है, वैसे ही संत जाति - भेष को त्याग कर दोनों के बीच से प्रभु की ओर ऊंचा जाता है । रस रूप ब्रह्म को प्राप्त करने की यह तीसरी मध्य मार्ग रूप पद्धति है ।
.
संसार समुद्र पख१ सीप द्वै, मधि मुक्ता सु महंत२ ।
सो रज्जब उर शिर धरै, ब्रह्म आदि पर्यन्त ॥७॥
समुद्र की सीप के दो पक्ष१ होते हैं, जो स्वाति बिन्दु उन दोनों के बीच में पड़ती है उसी का मोती अच्छा बनता है और उसे ही भूषण रूप से शिर तथा छाती पर धारण करते हैं, वैसे ही संसार में जाति और भेष दो पक्ष हैं इन दोनों को त्याग कर मध्य मार्ग का आश्रय लेता है, उस महान् संत२ को ब्रह्मादि पर्यन्त सभी शिरोमणी समझकर उसका उपदेश हृदय में धारण करते हैं ।
.
संसार सर्प मंडाण१ मुख, पख जाङ्यों२ बिष होय ।
तहां मुनी मणि नीपजे, निर्पख निर्विष सोय ॥८॥
सर्प के मुख में ऊपर नीचे की दोनों दाढो२ में विष होता है, उसके बीच में मणि उत्पन्न होकर रहते हुये भी विष रहित रहती है, वैसे ही संसार की सजावट१ में जाति भेद की पक्ष वा स्वपक्ष-परापक्ष इन दोनों के बीच में रहता है, किसी एक के आग्रह में नहीं पड़ता, वही संत बनता है और विषय - विष से रहित रहता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें