मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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७५ - परा भक्ति प्रार्थना । कहरवा
रमैया, यहु दुख सालै मोहि ।
सेज सुहाग न प्रीति प्रेम रस, दरशन नाँहीं तोहि ॥टेक॥
अँग प्रसंग एक रस नाँहीं, सदा समीप न पावै ।
ज्यों रस में रस बहुरि न निकसै, ऐसे होइ न आवै ॥१॥
आत्मलीन नहीं निशिवासर, भक्ति अखँडित सेवा ।
सन्मुख सदा परस्पर नाँहीं, तातैं दुख मोहि देवा ॥२॥
मगन गलित महारस माता, तूँ है तब लग पीजै ।
दादू जब लग अंत न आवै, तब लग देखन दीजै ॥३॥
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पराभक्ति को प्राप्त करने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं - 
हे सब में रमने वाले राम ! आप मेरी हृदय - शय्या पर पधार करके मुझे सुहाग सुख नहीं देते, न मेरी प्रीति के अनुसार अपना प्रेम - रस प्रदान करते और न आपका दर्शन ही होता है । यही दु:ख मुझे दु:खी कर रहा है । 
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आपके स्वरूप से निरँतर सँयोग का अवसर नहीं मिलता, न आपकी सदा समीपता ही प्राप्त होती है । जैसे इक्षु - रस में इक्षु - रस मिलकर फिर अलग नहीं निकलता, वैसे ही आप के स्वरूप में हमारा आत्मा लय होकर फिर अलग नहीं निकल सके, ऐसी अद्वैत अवस्था प्राप्त नहीं हो रही है । 
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बुद्धि अखँडित सेवा - भक्ति द्वारा सदा आपके सन्मुख रह कर दिन - रात आप में लीन नहीं रहती और आप परमात्मा तथा मेरी आत्मा परस्पर एक नहीं होते । हे देव ! इसीलिए मुझे दु:ख है । 
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प्रभो ! जब तक आप का स्वरूप प्रतीति मात्र भिन्न भास रहा है, तब तक अहँकार को नष्ट करके आपके प्रेम में निमग्न होकर आप के साक्षात्कार रूप महा - रस का पान करते हुये मस्त रहूं, ऐसी कृपा करिये । प्रभो ! जब तक मेरे देह का अन्त समय न आये तब तक तो मुझे उक्त प्रकार पराभक्ति द्वारा आपका दर्शन करने दीजिये, फिर तो मैं आपका रूप हो ही जाऊंगा ।
(क्रमशः)

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