🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*सुन्दर सद्गुरु हाथ में, करडी लई कमान ।*
*मार्यो खैंच कसीस कर, बचन लगाया बाण ॥*
.
*जिनि बचन बाण लगाय उर में,*
*मृतक फेर जिवाइया ।*
*मुख द्वार होय उचार कर,*
*निज सार अमृत पाइया ॥*
*अत्यन्त कर आनन्द में,*
*हम रहत आठों याम हैं ।*
*दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु,*
*ताहि मोर प्रणाम हैं ॥*
===============
थोड़ा विचार करे मनुष्य, धन यदि हो तो धन की व्यर्थता अनुभव कर लेना सरल है। धन न हो तो धन व्यर्थ है, ये अनुभव करना थोड़ा कठिन है। जो नहीं है पास में उसकी व्यर्थता को मनुष्य कैसे परखेगा? सोना हो तो सोने को परखा जा सकता है कि खरा है या खोटा, सोना सपने में हो तो; स्वप्न के सोने को परखने की कोई कसौटी नहीं है। इसीलिये गरीब जब मंदिर जाता है तो धन मांगता है, पद मांगता है; बेटे की नौकरी नहीं लग रही, उसकी नौकरी लग जाए - ये मांगता है। जिसका संसार में अभाव है, गरीब मन्दिर में भी उसे ही मांगता है। लेकिन मेधा, प्रज्ञा इतनी प्रबल हो कि विचार करके व्यक्ति जाग सके और देख सके कि सब होगा तब भी अन्तस् की रिक्तता नहीं भरेगी?
.
दूसरे जिनके पास प्रत्येक समृद्धि है, उनकी भी भीतर की रिक्तता समृद्धि से कभी भी भर नहीं सकी है - यदि ये प्रतीति हो सके तो स्वयं के पास कुछ न होने पर भी व्यक्ति ये अनुभव कर लेगा कि संसार व्यर्थ है। लेकिन ये थोड़ा कठिन है। क्योंकि जिनके पास सब है उन्हें ही ये प्रतीति जल्दी हो नहीं पाती। तब ये सोचना कि जिनके पास नहीं है, उन्हें प्रतीति हो जाए ...........। ये संभावना तो है, लेकिन बड़ी दुर्लभ संभावना है। *जीवन में जो मनुष्य के पास नहीं है, उसकी कामना प्रत्येक क्षण मनुष्य को घेरे रहती है।*
.
जो नहीं मिल सका है -
किसी को धन नहीं मिला है -
किसी को प्रेयसी नहीं मिली है -
किसी को पद-प्रतिष्ठा नहीं मिली है -
तो मनुष्य और-२ जन्म लेना चाहता है। अनंत जन्म मनुष्य ले चुका है, प्रत्येक जन्म में कुछ न कुछ अभाव रह जाता है - उसी की पूर्ति के लिए अगला जन्म-और अगला जन्म। वासनाएं दुष्पूर हैं। आवश्यकताएँ थोड़ी ही हैं। वासनाओं के सहारे ही मनुष्य जीवन जीए चला जाता है। *ध्यान रहे, धन बंधन नहीं है, धन की आकांक्षा बंधन है; पद-प्रतिष्ठा बंधन नहीं है, पद-प्रतिष्ठा की आकांक्षा बंधन है।*
.
सम्राट जनक के पास सब था, देख लिया सब; वे तैयार ही खड़े थे; कि कोई इशारा भर कर देता,तो वे जाग ही जाते। सारे सपने व्यर्थ हो चुके थे। इसीलिये अष्टावक्र को परम् शिष्य मिल सका। जनक ने अष्टावक्र के वचनों को सुनने के बाद कहा: मैं निर्दोष हूं,शांत हूं,बोध हूं, प्रकृति से परे हूं ! आश्चर्य कि इतने काल तक मोह के द्वारा बस ठगा गया हूं। *उतरने लगी किरण ! अहो निरंजन ! आश्चर्य !*
.
सुनते ही किरण प्राणों की अंतिम गहराई तक प्रविष्ट कर गई। चौंक गए जनक ! जो सुना, वह कभी सुना न था। अष्टावक्र में जो देखा, वह कभी देखा न था - ऐसा अपूर्व प्रकट हुआ। चकित हुए जनक ! बोध हुआ कि मैं निरंजन हूं ! एकदम से भरोसा नहीं आया, विश्वास नहीं हुआ। असत्य पर मनुष्य ने जन्मों-२ से विश्वास किया है, इसीलिये सत्य पर एकदम से भरोसा नहीं आता। *अंधे को अचानक दृष्टि मिल जाए, वह विश्वास कर सकेगा क्या? कि प्रकाश है, रंग हैं, हजार-२ रंग हैं; फूल हैं - वह आश्चर्य करेगा कि मैं इन सबकी कल्पना भी नहीं कर सकता था। और ये हैं !*
.
प्रकाश तो दूर, अंधे मनुष्य को अंधेरे का भी ज्ञान नहीं होता। साधारणतः मनुष्य ऐसा सोचता है कि अंधे को अँधेरे का पता होता है। लेकिन अंधेरे को देखने के लिए भी आंख चाहिए। मनुष्य आँख बंद करता है तो अँधेरा उसे इसीलिये दिखाई देता है क्योंकि आँखे खुली हुयी रहने पर मनुष्य को प्रकाश दिखाई देता है। जिसकी कभी आँख खुली ही नहीं, जिसने प्रकाश जाना नहीं; वो अँधेरा भी नहीं जान सकेगा। इसीलिये अचानक दृष्टि मिलने पर भरोसा ही न आएगा। जनक को भी ठीक ऐसा ही हुआ।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें