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*दादू हिन्दू तुरक का, द्वै पख पंथ निवार ।*
*संगति साचे साधु की, सांई को संभार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
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सुन्नत सेती१ बाप था, मा के बींधे कान ।
दोनों बिच बालक भया, तहाँ नहीं नुकसान ॥२९॥
पिता सुन्नत के सहित१ था और माता के कानों में छिद्र थे, दोनों से बालक उत्पन्न हुआ उसमें सुन्नत तथा कान बींधना रूप दोनों ही हानि नहीं होती । अत: सुन्नत आदि संस्कार पीछे किये जाते हैं, प्रकृति निष्काम है वह मुसलमान तथा हिन्दूपना नहीं बनाती ।
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सुन्नत सेती बाप था, बेटा हिन्दू होय ।
रज्जब कहिये तुरक क्यों, कट्या न आवे कोय ॥३०॥
पिता सुन्नत के सहित था, उसके पुत्र हिन्दू ही जन्मता है, वह कटा हुआ तो आता नहीं, तब उसे मुसलमान कैसे कहा जाय ?
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हिन्दू गति१ हिरदै नहीं, तुरक तमा२ कछु नाँहिं ।
रज्जब बंदे३ वस्तु के, कहाँ घुसै इन माँहिं ॥३१॥
निष्पक्ष के हृदय में हिन्दुओं की चेष्टा१ भी नहीं होती और मुसल्मानपने की इच्छा२ भी नहीं होती, जो ब्रह्मरूप वस्तु के भक्त३ हैं, वे इनमें कहाँ घुसते हैं ? वे तो निष्पक्ष ही रहते हैं ।
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हिन्दू गति हिन्दू खुशी, तुरक जु तुरकी माँहिं ।
रज्जब आशिक एक के, तिनके दोन्यों नाँहिं ॥३२॥
हिन्दूओं की चेष्टा से हिन्दू प्रसन्न होते हैं और मुसलमानों की चेष्टा से मुसल्मान प्रसन्न होते हैं, किन्तु जो एक अद्वैत ब्रह्म के प्रेमी संत हैं, उनके हृदय में उक्त दोनों ही पक्ष नहीं होती ।
(क्रमशः)

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