🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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८१ - करुणा । झपताल
गोविन्द ! कैसे तरिये ।
नाव नाँहीं खेव१ नाँहीँ, राम विमुख मरिये ॥टेक॥
ज्ञान नाँहीँ ध्यान नाँहीं, लै समाधि नाँहीं ।
विरहा वैराग नाँहीं, पँचौं गुण२ माँहीं ॥१॥
प्रेम नाँहीं प्रीति नाँहीं, नाम नाँहीं तेरा ।
भाव नाँहीं भक्ति नाँहीं, कायर जीव मेरा॥२॥
घाट नाँहीं बाट नाँहीं, कैसे पग धरिये ।
वार नाँहीं पार नाँहीं, दादू बहु डरिये ॥३॥
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भगवत् प्राप्ति के लिए दु:ख प्रकट कर रहे हैं, हे गोविन्द ! हम इस सँसार - सागर से कैसे पार होंगे ? न तो हमारे पास साधन रूप नौका है, न साधन - नौका द्वारा पार कराने वाला गुरु - केवट१ है और न देने को किराया१ है । हम तो राम से विमुख रह कर सँसार - सिन्धु में डूबकर मरने वाले ही हैं ।
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न हमारे में आत्म - ज्ञान है, न ध्यान ही करते हैं, न स्वस्वरूपाकार वृत्ति ही रखते हैं, न समाधि ही लगाते हैं, न हमारे में विरह है, न वैराग्य ही है । मन विषयों२ में फंस रहा है वो पँचों इन्द्रियाँ विषयों२ मेँ फंस रही हैं ।
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न सन्तों में प्रेम है, न आप में प्रीति है, न आपका नाम चिन्तन ही करते हैं । न आप में श्रद्धा - भक्ति है । यह हमारा मन उक्त साधनों के करने में तो बड़ा ही कायर है ।
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तैरने योग्य सँसार - सिन्धु का ऐसा कोई घाट और मार्ग नहीं दृष्टि पड़ता, जिससे हम पार हो सकें । फिर पार जाने के लिए इस अथाह सँसार - सिन्धु में कैसे पैर रक्खें, इसका वार - पार भी तो ज्ञात नहीं होता । अत: इसको पार करने में हम बहुत डर रहे हैं ।
(क्रमशः)

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