🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*वैरी मारे मरि गये, चित तैं विसरे नांहि ।*
*दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥*
============================
साभार ~ satsangosho.blogspot.com
ज्ञान हो जाने के पश्चात भी यदि त्याग की चेष्टा चले, तो समझ ले मनुष्य की ज्ञान अभी घटित हुआ नहीं है। मूढ़ों के अतिरिक्त त्याग और कोई करता नहीं है।ज्ञानी क्यों त्याग करेगा? ज्ञानी को बोध ही पर्याप्त है। उसे ये प्रतीति हो गई कि सब मायाजाल है, बस इतना ही पर्याप्त है। ज्ञानी आंदोलित नहीं होता - न पक्ष में, न विपक्ष में - न आकर्षण में, न विकर्षण में; ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति न तो रागी होता है और न विरागी। ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति न तो भोगी होता है और न त्यागी; क्योंकि भोगी और त्यागी दोनों होने के लिए स्वप्नवस्था चाहिए। दोनों का स्वप्न एक ही है, दोनों की मान्यता एक ही है। एक के लिए धन ही सब कुछ है और दूसरे के लिए धन मिट्टी है।
.
इस प्राचीन कथा का उल्लेख प्रासंगिक है। रांका और बांका पति-पत्नी थे। रांका बड़ा त्यागी था, उसने सब त्याग दिया था। प्रतिदिन जंगल में जाकर लकड़ियां काट कर लाता था और बेच कर अपनी जीविका चलाता था। स्वयं के खर्चे के बाद जो बचता था, उसे बांट देता था। रात्रि में खाली हाथ होकर सुबह फिर लकड़ी काटने जंगल चला जाता था। एक बार तीन दिनों तक बीमारी के कारण जंगल न जा सका और तीनों दिन उसे और उसकी पत्नी बांका को उपवास करना पड़ा।
.
चौथे दिन कमजोर होने के बावजूद भी उसे जंगल जाना पड़ा। बांका भी उसका साथ देने उसके साथ गई। लकड़ी काट कर गट्ठर सिर पर रख कर रांका आगे-२ और बांका उसके पीछे चलने लगी। रांका ने देखा कि राह के किनारे एक स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली पड़ी है। उसके मन में ख्याल आया कि मैं तो ठहरा त्यागी, मेरे लिए तो धन मिट्टी है; लेकिन पत्नी तो ठहरी संसारी; उसके भीतर लोभ न जाग जाए, कि ले चले थैली दुर्दिन में ये धन काम आएगा।
.
ऐसा ख्याल आते ही उसने जल्दी-२ पैरों से मिट्टी डालकर उस थैली को दबा दिया। तभी बांका आ गई और उसने पूंछा कि क्या कर रहे हो? झूठ न बोलने कि कसम रांका ने खा रखी थी, इसलिए झूठ न बोल सका। मुश्किल में पड़ गया कि क्या बताये; स्त्री जाति का क्या भरोसा?
.
लेकिन झूठ भी न बोल सका और कहा कि देख लोभ न करना ये स्वर्ण मुद्राओं की थैली पड़ी थी, तेरा लोभ न जग जाए; इसीलिये इस पर मिट्टी डाल रहा था। बांका ये सुन कर हंसने लगी कि ये भी क्या खूब कर रहे हो, मिट्टी पर मिट्टी डाल रहे हो। भीतर तुम्हारे लोभ अभी बाकी है और उसी लोभ को मेरे पर आरोपित कर रहे हो। अशर्फियां अभी भी तुम्हे कीमती दिखाई दे रही हैं। अभी भी तुम्हे मिट्टी और धन में अंतर दिखाई दे रहा है। वह बांका समझती थी वास्तविक त्याग !
.
भोग और त्याग दोनो अज्ञानी के हैं। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें