सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग. २८/३२


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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सतगुरु शब्द बाण*
*दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ ।*
*जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥२८॥*
*सतगुरु शब्द मुख सौं कह्या, क्या नेड़े क्या दूर ।*
*दादू सिष श्रवणहुँ सुण्या, सुमिरण लागा सूर ॥२९॥*
शिष्य चाहे गुरु के पास हो या दूर । वे गुरुमुख से निकले शब्दबाण शिष्य के श्रवण में जाकर हृदय में प्रवेश कर जाते हैं । जिससे ज्ञान का दीपक प्रज्जवलित करके शिष्य की मोहनिशा को दूर कर देते हैं । शिष्य भी सुनते ही हरिस्मरण में लग जाता है और कामादि शत्रुओं को जीतने में शूर-वीर हो जाता है ॥२८-२९॥

*करनी बिना कथनी*
*शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढ़ै कोइ ।*
*दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥३०॥*
*शब्द दूध घृत राम रस, कोई साध बिलोवणहार ।*
*दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥३१॥*
*घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर ।*
*दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥३२॥*
सद्गुरु के वाक्य सत्य ब्रह्म के बोधक होने से दुग्ध की तरह मधुर शुद्ध आत्मबलप्रदयाक, घृतसदृश स्निग्ध सर्वप्रिय, सर्वत्र सर्वदा सुखकर तथा भक्तजनों द्वारा आस्वाद्य रामरस से पूर्ण होते हैं । तथापि “रसो वै सः” इस श्रुति के अनुसार रसरूप उस राम का आस्वादन सभी नहीं कर सकते; किन्तु जिन पर गुरुकृपा और भगवत्कृपा है वे ही आत्मा का श्रवण मनन निधिध्यासन द्वारा असम्भावना-विपरीत भावना आदि दोषों को हटाकर बुद्धि के दोषों से शून्य ज्ञानी पुरुष प्रत्यगानन्द स्वरूप चिदानन्दमय ब्रह्म को गुरुपदिष्ट मार्ग द्वारा पद्मासन में स्थित होकर हृत्त्कर्णिका के मध्य दीपक की तरह स्थित चित्त से उपासना द्वारा रामरस का आस्वादन करते हैं । उपनिषद् में लिखा है-
“अन्तःकरण को नीचे की लकड़ी बनाकर तथा ओंकार को ऊपर की लकड़ी बनाकर ध्यानरुपी मन्थन के अभ्यास से उस निगूढ परमात्मा को देखते हैं ।”
“ओंकार ही धनुष है और जीव ही शर है एवं परमात्मा ही उस शर का लक्ष्य है ।” अन्य श्रुति का भी यही भाव है ।
उस लक्ष्य ब्रह्म को साधक सावधान चित्त से तन्मय होकर वेध सकता है, जैसे दूध में घृत व्यापक है, परन्तु उसको बिलो कर(मथ कर) अलग करने वाले बहुत कम हैं, बात बनाने वाले अधिक है ॥३०-३२॥
(क्रमशः)

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