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*ज्यों यहु काया जीव की, त्यों सांई के साध ।*
*दादू सब संतोषिये, मांहि आप अगाध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग ३* *भेष भक्ति*
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ओड़छे के राजा मधुकरशाह की साधु भेष में बड़ी प्रीति थी । वे संतों का चरणामृत लेते थे, पूजा परिक्रमा करते थे । राजा के भाई बंधुओं को यह अच्छा नहीं लगता था ।
एक दिन उन्होने एक गधे को बहुत सी मालाऐं पहना कर तथा तिलक लगाकर महल में भेज दिया राजा ने उसके चरण धोये, पूजा परिक्रमा की और बोले - 'मैं धन्य हूं जो मेरे राज्य में गधे भी भक्त बनकर माला तिलक धारण करने लगे हैं । जो माला तिलक नहीं धारण करते है वे गधों से भी बुरे हैं । यह देख सुन कर दुष्टों को बड़ी लज्जा आई ।
इससे सूचित होता है कि भेष भक्त की भेष में बड़ी प्रीति होती है ।
भेष भक्त की भेष में, होती अति अनुरक्ति ।
मधुकरशाह ने गधे की, पूजा की सहभक्ति ॥२२७॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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